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गैंगस्टर अबू सलेम को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसकी रिमिशन (सजा में छूट) से जुड़ी याचिका खारिज करते हुए साफ कर दिया कि सिर्फ 25 साल की सजा पूरी होने का दावा किसी कैदी को स्वतः रिहाई का अधिकार नहीं देता। कोर्ट के इस फैसले ने सलेम की उस उम्मीद पर फिलहाल विराम लगा दिया है, जिसमें वह जल्द जेल से बाहर आने की राह देख रहा था।
25 साल पूरी होने की दलील पर कोर्ट सख्त
अबू सलेम ने अपनी याचिका में दावा किया था कि वह 1993 मुंबई धमाकों और एक कारोबारी की हत्या से जुड़े मामलों में 25 साल की सजा पूरी कर चुका है, इसलिए उसे रिहा किया जाना चाहिए लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार करते हुए कहा कि अलग-अलग मामलों में दी गई सजाओं का पालन करना अनिवार्य है और सिर्फ एक तय अवधि पूरी होने से रिहाई का अधिकार नहीं बनता।
प्रत्यर्पण समझौते का दिया था हवाला
सलेम ने भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते का हवाला देते हुए कहा था कि उसे 25 साल से अधिक की सजा नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर उसने रिमिशन का लाभ मांगते हुए जेल से रिहाई की अपील की थी। हालांकि अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस के. खाता की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इस स्तर पर यह मान लेना कि 25 साल की सजा पूरी हो चुकी है, सही नहीं होगा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि सजा में छूट की गणना रिहाई से ठीक एक महीने पहले की जानी चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए साफ शब्दों में कहा “यह याचिका खारिज की जाती है।”
सरकार का पक्ष भी रहा सख्त
सरकार ने कोर्ट में सलेम की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उसने अब तक केवल 19 साल ही जेल में बिताए हैं और उसकी समय से पहले रिहाई पर फैसला अभी लंबित है। ऐसे में 25 साल की सजा पूरी होने का दावा तथ्यों के अनुरूप नहीं है।
क्या है पूरा मामला
2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के दौरान भारत ने यह आश्वासन दिया था कि अबू सलेम को मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा और उसकी सजा 25 साल से अधिक नहीं होगी। सलेम को 1993 मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि कानूनी प्रक्रिया में किसी एक दलील के आधार पर राहत मिलना आसान नहीं होता। अबू सलेम की रिहाई का रास्ता अभी भी लंबा और कानूनी उलझनों से भरा नजर आ रहा है।




