नोएडा हिंसा की ‘ब्लूप्रिंट’ बेनकाब: QR कोड से भीड़, पाकिस्तान से पोस्ट- पुलिस का बड़ा खुलासा

The Red Ink
नोएडा में हुई हिंसा को लेकर अब जो तस्वीर सामने आई है, वह इसे महज़ एक मजदूर प्रदर्शन नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करती है। पुलिस कमिश्नरेट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो इस पूरे घटनाक्रम को एक संगठित ऑपरेशन की तरह पेश करते हैं जहां भीड़ को तैयार किया गया, भड़काया गया और फिर हिंसा की ओर मोड़ा गया।

‘हर आंदोलन में मौजूद’- संदिग्ध चेहरों की भूमिका
जांच के दायरे में आए तीन नाम- मनीषा चौहान, रूपेश राय और आदित्य आनंद को इस पूरे घटनाक्रम में अहम कड़ी माना जा रहा है। पुलिस के मुताबिक रूपेश राय 2018 से देशभर में अलग-अलग आंदोलनों में सक्रिय रहा है जबकि आदित्य आनंद 2020 से इसी तरह की गतिविधियों में लगातार देखा गया। दोनों की पहचान की अगर बात की जाए तो एक साधारण ऑटो चालक, दूसरा बेरोजगार लेकिन गतिविधियां असामान्य बताई जा रही हैं। इनकी मौजूदगी लगभग हर बड़े विरोध प्रदर्शन में दर्ज होना जांच एजेंसियों के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है।

QR कोड से ‘डिजिटल मोबिलाइजेशन’ का खेल
इस बार भीड़ सिर्फ सड़कों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से निकली।
पुलिस के अनुसार-
A- 31 मार्च और 1 अप्रैल को मूवमेंट की नींव रखी गई
B- 9-10 अप्रैल को QR कोड के जरिए WhatsApp ग्रुप बनाए गए
C- 10 अप्रैल को मजदूरों को संगठित कर मैदान में उतारा गया
D- 11 अप्रैल को रोड जाम के लिए उकसाया गया
दिलचस्प यह है कि 11 अप्रैल को जब मामला शांत हो चुका था, उसी वक्त भड़काऊ भाषणों से माहौल फिर गरमा दिया गया।

13 अप्रैल: तय स्क्रिप्ट के मुताबिक भड़की हिंसा?
पुलिस का दावा है कि 13 अप्रैल को मदरसन के सामने भीड़ जुटाना भी एक सोची-समझी रणनीति थी। हालात काबू में आते ही सोशल मीडिया पर अचानक भड़काऊ कंटेंट की बाढ़ आ गई, दो X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट्स से फैलाई गई सूचनाएं मौके पर मौजूद लोगों को सीधे प्रभावित कर रही थीं।

पाकिस्तान कनेक्शन का दावा, VPN से छुपी लोकेशन
जांच में सबसे बड़ा खुलासा ये दोनों X अकाउंट्स पाकिस्तान से संचालित पाए गए जो पिछले तीन महीनों से एक्टिव थे, VPN के जरिए लोकेशन छुपाई जा रही थी। पुलिस का मानना है कि यह सिर्फ स्थानीय असंतोष नहीं, बल्कि औद्योगिक क्षेत्रों को अस्थिर करने की बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है।

भीड़ में ‘बाहरी’ चेहरे, मजदूर नहीं
हिंसा में शामिल लोगों की प्रोफाइल भी कई सवाल खड़े करती है-
1- अब तक 62 लोगों की गिरफ्तारी
2- आगजनी और पुलिस पर हमले में शामिल लोग चिन्हित
3- बड़ी संख्या में आरोपी फैक्ट्री मजदूर नहीं, बल्कि बाहरी
4- यानी जिस आंदोलन को मजदूरों का बताया जा रहा था, उसमें असली भीड़ कहीं और से आई थी।
5- डिजिटल अफवाह से सड़कों तक पूरा मॉडल तैयार।

पुलिस के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम में-
1- डेटा बेस का इस्तेमाल कर लोगों को टारगेट किया गया,
2- सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव तैयार हुआ,
3- अफवाहें फैलाकर भीड़ को उकसाया गया,
इस मामले में 13 मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें सोशल मीडिया अकाउंट्स भी शामिल हैं।

गिरफ्तारियां और आगे की कार्रवाई
रूपेश राय और मनीषा चौहान गिरफ्तार, आदित्य आनंद अब भी फरार कई अन्य संदिग्धों की तलाश जारी। पुलिस ने साफ संकेत दिया है कि इस मामले में NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत भी कार्रवाई हो सकती है।

बड़ी तस्वीर क्या कहती है?
नोएडा हिंसा अब सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं रही। यह मामला कई परतों वाला है जमीन पर भीड़, मोबाइल पर नैरेटिव और पीछे से संचालित नेटवर्क, पुलिस की जांच अब इस सवाल पर टिकी है क्या यह सिर्फ विरोध था, या फिर किसी बड़े खेल की रिहर्सल?

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