पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: रिकॉर्ड वोटिंग के पीछे क्या है वजह? SIR विवाद वाले इलाकों में भी उमड़ा जनसैलाब

The Red Ink: 91 लाख नाम हटने के विवाद के बीच 92.88% मतदान; प्रवासी वोटर्स की वापसी और “नाम कटने के डर” ने बढ़ाई भागीदारी…

रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने बदली चुनावी तस्वीर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में मतदान ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस चरण में करीब 92.88 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई, जो राज्य के चुनावी इतिहास में सबसे अधिक मानी जा रही है। इससे पहले 2011 में 84.72 प्रतिशत मतदान हुआ था, जिसे अब पीछे छोड़ दिया गया है।

गर्मी और छिटपुट झड़पों के बावजूद लंबी कतारें
तेज गर्मी (कई जगह 41°C से ऊपर) और कुछ इलाकों में मामूली झड़पों के बावजूद सुबह से ही मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ देखी गई। आम तौर पर दोपहर बाद बढ़ने वाली भीड़ इस बार सुबह से ही लगातार बनी रही। ग्राउंड रिपोर्ट्स के मुताबिक, नंदीग्राम जैसे संवेदनशील इलाकों में भी इस बार शांतिपूर्ण मतदान देखने को मिला और मतदाताओं में उत्साह साफ नजर आया।

जहां ज्यादा नाम कटे, वहीं ज्यादा वोटिंग—संकेत क्या?
चुनाव से पहले SIR (मतदाता सूची पुनरीक्षण) प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख नाम हटाए जाने का मुद्दा बड़ा विवाद बना रहा। दिलचस्प बात यह है कि जिन इलाकों में नाम कटने की दर ज्यादा रही, वहीं मतदान प्रतिशत भी सबसे अधिक दर्ज किया गया। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और बीरभूम के कई विधानसभा क्षेत्रों में 95% से ज्यादा वोटिंग हुई।

‘नाम कटने का डर’ बना बड़ी वजह
कई मतदाताओं ने मीडिया रिपोर्ट्स में बताया कि उन्हें यह आशंका थी कि अगर इस बार वोट नहीं डाला, तो भविष्य में उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है। इस डर के चलते बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने क्षेत्रों में वापस लौटे और वोटिंग में हिस्सा लिया। खासतौर पर प्रवासी मजदूरों में यह रुझान ज्यादा देखने को मिला।

प्रवासी वोटर्स की घर वापसी से बढ़ी भीड़
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में काम कर रहे हजारों बंगाली चुनाव से पहले अपने घर लौटे। चुनाव से पहले के दिनों में ट्रेन, बस और फ्लाइट टिकट की भारी मांग देखी गई। हावड़ा, सियालदह और न्यू जलपाईगुड़ी जैसे प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ उमड़ी।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज
सत्ताधारी Trinamool Congress ने आरोप लगाया कि Bharatiya Janata Party ने प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए विशेष ट्रेनें चलवाईं, जो आचार संहिता का उल्लंघन है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

विशेषज्ञों की राय: आंकड़ों का दूसरा पहलू भी
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त S. Y. Quraishi के मुताबिक, पश्चिम बंगाल हमेशा से हाई-वोटिंग राज्य रहा है। उनका मानना है कि अगर मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटते हैं, तो प्रतिशत के हिसाब से वोटिंग ज्यादा दिखाई दे सकती है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि “डर और असुरक्षा की भावना” ने कुछ हद तक लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित किया।

कम SIR असर वाले जिलों में अपेक्षाकृत कम वोटिंग
जहां SIR प्रक्रिया के दौरान कम नाम हटाए गए जैसे पुरुलिया, कलिम्पोंग और झाड़ग्राम, वहां वोटिंग प्रतिशत राज्य के औसत से कम रहा। कलिम्पोंग में मतदान करीब 83% के आसपास दर्ज किया गया।

राजनीतिक दलों में बढ़ी उम्मीदें, शुरू हुआ माइक्रो एनालिसिस
रिकॉर्ड वोटिंग के बाद सत्ताधारी और विपक्ष, दोनों खेमे इसे अपने पक्ष में मानकर चल रहे हैं। Mamata Banerjee ने इसे “अधिकारों की रक्षा की लड़ाई” बताया, वहीं Amit Shah ने इसे “डर से मुक्त मतदान” का संकेत कहा। दोनों ही पार्टियां अब सीट-दर-सीट विश्लेषण में जुट गई हैं, ताकि इस भारी मतदान के राजनीतिक असर को समझा जा सके।

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