NALSAR Enrollment Controversy को लेकर देश के कानूनी और शैक्षणिक जगत में बहस तेज हो गई है। हैदराबाद स्थित नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों के एनरोलमेंट पर लगाए गए प्रतिबंध को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा वापस लेने के बाद अब इस पूरे मामले पर सवाल उठने लगे हैं।
सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की है।
सौरव दास ने उठाए जवाबदेही के सवाल
NALSAR Enrollment Controversy के बीच सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नेतृत्व को लेकर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
उन्होंने लिखा कि मनन कुमार मिश्रा वर्ष 2012 से बीसीआई का नेतृत्व कर रहे हैं और उनका कार्यकाल 2030 तक जारी रहने वाला है। दास के मुताबिक किसी भी संस्था में इतना लंबा कार्यकाल तब और अधिक सवाल खड़े करता है, जब उस पर शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हों।
उन्होंने सीधे मनन कुमार मिश्रा को टैग करते हुए लिखा कि अब उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने देश की सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश जारी कर कहा कि नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में एनरोलमेंट अगले आदेश तक न किया जाए।
इस फैसले ने छात्रों और कानूनी समुदाय के बीच चिंता पैदा कर दी थी। कई लोगों ने इसे छात्रों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मामला बताया था।
हालांकि बाद में बीसीआई ने अपना यह फैसला वापस ले लिया, जिसके बाद बहस का नया दौर शुरू हो गया।
BCI ने मांगी तथ्यात्मक रिपोर्ट
NALSAR Enrollment Controversy से जुड़े घटनाक्रम में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने विश्वविद्यालय प्रशासन से एक विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है।
बीसीआई जानना चाहता है कि वे कौन लोग थे जो भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को नालसार के दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने के विरोध में चलाए गए अभियान का हिस्सा बने थे।
बार काउंसिल ने विश्वविद्यालय से इस पूरे घटनाक्रम की तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है।
CJI सूर्यकांत के निमंत्रण को लेकर शुरू हुआ था विवाद
पिछले सप्ताह नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।
विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों और समूहों ने इस निमंत्रण का विरोध किया था। इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस पर संज्ञान लिया।
यही विवाद आगे चलकर छात्रों के एनरोलमेंट संबंधी फैसले तक पहुंच गया।
छात्रों के भविष्य को लेकर उठी चिंता
एनरोलमेंट पर अस्थायी रोक लगाए जाने के फैसले ने 2026 बैच के छात्रों में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। कानूनी शिक्षा से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना था कि किसी संस्थान से जुड़े विवाद का असर सीधे छात्रों के पेशेवर भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए।
बीसीआई द्वारा फैसला वापस लेने के बाद छात्रों को राहत मिली है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने नियामक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और उनके निर्णयों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
कानूनी जगत में जारी है चर्चा
NALSAR Enrollment Controversy अब केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और नियामक संस्थाओं की जवाबदेही जैसे बड़े सवालों से भी जुड़ गया है।
आने वाले दिनों में बीसीआई की रिपोर्ट, विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया और इस विवाद से जुड़े अन्य पक्षों के बयान इस मामले की दिशा तय कर सकते हैं।




