Tutankhamun Tomb की खोज 20वीं सदी की सबसे चर्चित पुरातात्विक खोजों में गिनी जाती है। करीब 3,300 साल पुराने इस मक़बरे ने दुनिया को प्राचीन मिस्र के उस दौर की ऐसी झलक दिखाई, जिसने इतिहास, पुरातत्व और लोकप्रिय संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया। ब्रिटिश पुरातत्वविद् हावर्ड कार्टर और उनकी टीम जब इस मक़बरे के भीतर पहुंची, तो उन्हें चारों तरफ सोने की चमक, मूर्तियां, दुर्लभ वस्तुएं और राजसी वैभव दिखाई दिया।
तूतनख़ामेन प्राचीन मिस्र के 18वें राजवंश के 11वें फ़ैरो थे। अपने शासनकाल के लिए वह विशेष रूप से प्रसिद्ध नहीं थे, लेकिन उनका लगभग सुरक्षित मिला मक़बरा उन्हें दुनिया के सबसे प्रसिद्ध प्राचीन राजाओं में शामिल कर गया। इस खोज के बाद प्राचीन मिस्र को लेकर पूरी दुनिया में एक नया आकर्षण पैदा हुआ।
Tutankhamun Tomb में मोमबत्ती की रोशनी से दिखा सोना
नवंबर 1922 में हावर्ड कार्टर ने किंग्स वैली में उस रास्ते का पता लगाया, जो आगे चलकर Tutankhamun Tomb तक पहुंचने वाला था। वर्षों से खुदाई कर रहे कार्टर के लिए यह खोज किसी चमत्कार से कम नहीं थी।
कहानी के मुताबिक, कार्टर ने एक छोटी सी दरार से अंधेरे कमरे के भीतर झांका। उनके साथ उनके धनी संरक्षक लॉर्ड कार्नरवॉन भी मौजूद थे। जब कार्नरवॉन ने पूछा कि क्या उन्हें कुछ दिखाई दे रहा है, तो कार्टर ने जवाब दिया था—“हाँ, अद्भुत चीज़ें।”
कमरे में जैसे-जैसे रोशनी पहुंची, वहां मौजूद वस्तुएं धीरे-धीरे दिखाई देने लगीं। अजीब जानवरों की आकृतियां, मूर्तियां और सोने से बनी वस्तुएं वहां मौजूद थीं। कार्टर ने बाद में याद किया कि हर तरफ सोने की चमक दिखाई दे रही थी।
यह खजाना युवा फ़ैरो की मृत्यु के बाद उनके परलोक के सफर के लिए रखा गया था।
सरकोफ़ेगस तक पहुंचने में लगे 15 महीने
1922 में मक़बरे का प्रवेश मिलने के बाद भी कार्टर और उनकी टीम का काम खत्म नहीं हुआ था। तूतनख़ामेन के पत्थर के सरकोफ़ेगस तक पहुंचने में उन्हें करीब 15 महीने और लगे।
12 फरवरी 1924 को कार्टर की टीम आखिरकार उस जगह तक पहुंची, जहां युवा राजा का सरकोफ़ेगस मौजूद था। वहां उन्हें एक के भीतर एक रखी गई कई राजसी संरचनाएं दिखाई दीं।
पीले क्वार्टज़ाइट पत्थर से बना विशाल सरकोफ़ेगस उस पूरी संरचना का अहम हिस्सा था। इसके पत्थर के ढक्कन का वजन करीब 1,130 किलोग्राम था। इसे विशेष पुली प्रणाली की मदद से उठाया गया।
ढक्कन हटने के बाद कार्टर के सामने युवा राजा के शव को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए तीन ताबूतों की श्रृंखला सामने आई। सबसे बाहरी ताबूत का निर्माण बेहद शानदार था और उसके भीतर तूतनख़ामेन के पार्थिव अवशेष सुरक्षित थे।
हावर्ड कार्टर कौन थे?
हावर्ड कार्टर की कहानी भी Tutankhamun Tomb की खोज जितनी ही दिलचस्प है। उन्होंने कोई औपचारिक पुरातात्विक प्रशिक्षण हासिल नहीं किया था। उन्होंने करीब 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था।
चित्रकारी में उनकी प्रतिभा को देखते हुए इंग्लैंड के नॉरफ़ॉक के पास रहने वाले एक अभिजात परिवार ने उन्हें संरक्षण दिया। एमहर्स्ट परिवार के डिडलिंग्टन हॉल में मिस्र से जुड़ी कई महत्वपूर्ण वस्तुओं का निजी संग्रह था। इन्हीं वस्तुओं ने कार्टर की प्राचीन मिस्र में रुचि बढ़ाई।
17 साल की उम्र में वह मिस्र पहुंचे और ड्राफ्ट्समैन तथा ट्रेसर के तौर पर काम शुरू किया। इसके बाद दो दशकों से ज्यादा समय तक उन्होंने काम करते हुए पुरातत्व की बारीकियां सीखीं।
Tutankhamun Tomb की खोज कैसे हुई?
किंग्स वैली नील नदी के पश्चिम में स्थित प्राचीन मिस्र के फ़ैरो का प्रमुख दफ़न क्षेत्र था। कार्टर कई वर्षों से यहां खुदाई कर रहे थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही थी।
तूतनख़ामेन के मक़बरे का प्रवेश लंबे समय तक मलबे की परतों के नीचे छिपा रहा। यही वजह थी कि प्राचीन कब्र लुटेरों और बाद के पुरातत्वविदों की नजर इस पर नहीं पड़ी।
नवंबर 1922 में कार्टर को निर्णायक सफलता मिली। जब उन्होंने मक़बरे के भीतर झांका तो उन्हें एक ऐसा दृश्य दिखाई दिया, जिसने प्राचीन मिस्र के इतिहास को दुनिया के सामने नए तरीके से रख दिया।
हालांकि यह केवल शुरुआत थी। मक़बरे के अंदर मौजूद हजारों वस्तुओं को व्यवस्थित करने और दस्तावेज तैयार करने में वर्षों लगे।
तूतनख़ामेन की मौत भी बनी रहस्य
तूतनख़ामेन की मृत्यु करीब 17 वर्ष की उम्र में हुई थी। माना जाता है कि उन्होंने लगभग आठ या नौ साल की उम्र में सिंहासन संभाला था।
उनकी मौत की वजह आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। उनकी मृत्यु को लेकर अलग-अलग सिद्धांत सामने आते रहे हैं। कुछ सिद्धांतों में हत्या की आशंका जताई गई, जबकि कुछ में शिकार के दौरान दुर्घटना जैसी संभावनाओं पर चर्चा की गई।
युवा राजा की कम उम्र में मृत्यु और उनके लगभग सुरक्षित मक़बरे की खोज ने उनके आसपास रहस्य का एक अलग संसार बना दिया।
प्राचीन मिस्र के आकर्षण से ‘ममी के श्राप’ तक
Tutankhamun Tomb की खोज के बाद 1920 के दशक में दुनिया भर में प्राचीन मिस्र को लेकर एक तरह का जुनून पैदा हो गया। मिस्र की कला, पिरामिड, कमल के फूल और प्राचीन आकृतियों का प्रभाव फैशन, आभूषण, कला, डिजाइन और यहां तक कि संगीत में भी दिखाई देने लगा।
कार्टर और लॉर्ड कार्नरवॉन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गए। लेकिन इसके कुछ ही समय बाद लॉर्ड कार्नरवॉन की मौत हो गई। बताया गया कि उनकी मृत्यु रक्त विषाक्तता से हुई थी और संक्रमण एक कीड़े के काटने के बाद हुआ था।
उनकी मौत के बाद तूतनख़ामेन के “श्राप” की कहानियां तेजी से फैलने लगीं। मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति ने इन घटनाओं को जोड़कर ‘ममी के श्राप’ का मिथक और मजबूत कर दिया।
हालांकि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इन घटनाओं को तूतनख़ामेन के किसी वास्तविक श्राप का प्रमाण नहीं माना जाता।
औपनिवेशिक दौर में खोज की राजनीति
मक़बरे की खोज ऐसे समय हुई जब मिस्र राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा था। 1882 से ब्रिटिश सेना का मिस्र पर कब्जा था, जबकि 1922 की शुरुआत में मिस्र को आंशिक स्वतंत्रता मिली थी।
कार्टर मिस्र सरकार की अनुमति से खुदाई कर रहे थे। उस समय पुरावशेषों को लेकर मिस्र और विदेशी पुरातत्वविदों के बीच अधिकार और नियंत्रण का सवाल भी महत्वपूर्ण था।
मक़बरे की खोज की कहानी में स्थानीय मिस्रवासियों की भूमिका को लंबे समय तक उतना महत्व नहीं मिला, जितना कार्टर और उनके यूरोपीय सहयोगियों को मिला। खुदाई में कई स्थानीय मजदूरों और कुशल फोरमैन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
3,000 साल बाद फिर सुनाई दी प्राचीन मिस्र की आवाज
तूतनख़ामेन के मक़बरे से मिली वस्तुओं में दो प्राचीन तुरहियां भी थीं। एक चांदी की और दूसरी कांसे की बनी थी।
1939 में बीबीसी ने इन तुरहियों से आवाज प्रसारित करने का एक असाधारण रेडियो कार्यक्रम आयोजित किया। दावा था कि इन वाद्ययंत्रों की आवाज हजारों वर्षों बाद पहली बार दुनिया भर के श्रोताओं तक पहुंचेगी।
कार्यक्रम में संगीतकार जेम्स टैपर्न ने तुरही बजाई। प्रसारण से पहले आशंका थी कि इतने पुराने वाद्ययंत्रों से स्पष्ट आवाज निकालना मुश्किल हो सकता है, लेकिन दोनों से ध्वनि निकली।
रेडियो निर्माता रेक्स कीटिंग ने कार्यक्रम के अंत में इसे हजारों वर्षों बाद मिस्र के अतीत की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया।
विडंबना यह थी कि कार्टर खुद यह प्रसारण सुनने के लिए जीवित नहीं थे। कार्यक्रम से कुछ सप्ताह पहले ही 64 वर्ष की उम्र में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई थी।
तूतनख़ामेन का खजाना आज भी लोगों को आकर्षित करता है
1970 के दशक में तूतनख़ामेन को लेकर दुनिया में फिर से जबरदस्त उत्साह पैदा हुआ। “Treasures of Tutankhamun” प्रदर्शनी इसका बड़ा कारण बनी।
इस प्रदर्शनी का सबसे बड़ा आकर्षण तूतनख़ामेन का प्रसिद्ध सोने का मुखौटा था। 1972 में ब्रिटिश म्यूज़ियम में आयोजित प्रदर्शनी को 16 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा। इसके बाद प्रदर्शनी सोवियत संघ और फिर अमेरिका के कई शहरों में पहुंची।
इस वैश्विक लोकप्रियता ने तूतनख़ामेन को सिर्फ इतिहास का विषय नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें लोकप्रिय संस्कृति का भी हिस्सा बना दिया।
Tutankhamun Tomb में आज भी छिपे हैं कई रहस्य
मक़बरे की खोज को एक सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद तूतनख़ामेन से जुड़ी कई वस्तुओं के रहस्य अभी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मक़बरे से मिली हजारों वस्तुओं का अध्ययन और वर्गीकरण अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। कुछ वस्तुएं इतनी अनूठी हैं कि उनकी तुलना के लिए समान उदाहरण भी उपलब्ध नहीं हैं।
2025 में तूतनख़ामेन के मक़बरे की पूरी सामग्री को पहली बार एक नए संग्रहालय में एक साथ प्रदर्शित किया गया। यह संग्रहालय गीज़ा में ख़ुफ़ू के महान पिरामिड के पास स्थित है।
तूतनख़ामेन का स्वर्ण मुखौटा अब संग्रहालय में प्रदर्शित है, जबकि उनकी ममी किंग्स वैली में ही सुरक्षित है।
और शायद इसी वजह से इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा असर डालने वाली चीज सोना या राजसी वैभव नहीं, बल्कि वह छोटी सी फूलों की माला है जिसका जिक्र हावर्ड कार्टर ने किया था।
कार्टर के मुताबिक, हजारों साल पुराने उस राजसी वैभव के बीच मुरझाए हुए फूल सबसे खूबसूरत चीज थे। उनके लिए वे फूल इस बात का एहसास कराते थे कि 3,300 साल का समय भी इंसानी भावनाओं के सामने कितना छोटा लग सकता है।




