लखनऊ बार चुनाव में ‘सिस्टम vs बदलाव’ की जंग: पहली बार महिला आरक्षण, 116 उम्मीदवारों के बीच हाई-वोल्टेज मुकाबला

The Red Ink
लखनऊ बार एसोसिएशन का इस साल का चुनाव महज पदों की लड़ाई नहीं, बल्कि सिस्टम में बदलाव की परीक्षा बन गया है। पहली बार लागू हुए महिला आरक्षण ने पूरे चुनावी समीकरण को बदल दिया है और मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प और तीखा हो गया है। कैसरबाग स्थित बार परिसर में सुबह से ही वकीलों की भीड़ जुटी है। 22 पदों के लिए 116 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि करीब 3800 अधिवक्ता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर नई कार्यकारिणी चुन रहे हैं।

महिला आरक्षण ने बदली तस्वीर
सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद इस बार पहली बार महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। कुल 7 पद महिलाओं के लिए आरक्षित, कोषाध्यक्ष पद पर 4 महिला उम्मीदवार, कार्यकारिणी की 6 सीटों में 3-3 महिलाओं के लिए जगह। इस फैसले के बाद चुनाव सीधे तौर पर “पुरानी व्यवस्था बनाम नई भागीदारी” की लड़ाई में बदल गया है।

वकीलों की राय- बदलाव या टकराव?
एडवोकेट सौरभ पांडेय का कहना है कि यह चुनाव बदलाव की दिशा तय करेगा। “यह नॉन-प्रैक्टिशनर और बाहरी लोगों के खिलाफ भी एक तरह की लड़ाई है।” वहीं कोषाध्यक्ष पद की प्रत्याशी मिथलेश अवस्थी ने कहा- “महिलाओं को मौका मिला है, अब वे अपनी भूमिका साबित करेंगी।” मतदान करने पहुंचे अधिवक्ता ललित किशोर तिवारी ने भी इस पहल को सही बताया लेकिन साथ ही कहा कि “अगर यह पहले लागू होता, तो हालात और बेहतर होते।”

बड़े पदों पर कड़ा मुकाबला
अध्यक्ष पद पर दिग्गज आमने-सामने हैं- जीएन शुक्ला (चच्चू), परशुराम मिश्रा, राजेंद्र कुमार शर्मा, रवींद्रनाथ पांडे और सुरेश पांडेय। मौजूदा अध्यक्ष रमेश प्रसाद तिवारी ने चच्चू को समर्थन देकर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। महामंत्री पद पर भी सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जहां आदर्श मिश्रा, जितेंद्र यादव (जीतू), कामिनी ओझा, कुलदीप वर्मा और मारुत शर्मा मैदान में हैं।

सुरक्षा कड़ी, नियम सख्त
चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए बार परिसर में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। पुलिस और PAC की तैनाती, हथियार लेकर प्रवेश पर पूरी तरह रोक, एल्डर कमेटी की निगरानी भी की जा रही है।

यह चुनाव सिर्फ पदों का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और बदलाव की दिशा तय करने वाला बड़ा मोड़ बन सकता है। अब नजर इस बात पर है कि क्या महिला आरक्षण नई राजनीति को जन्म देगा या पुराना सिस्टम एक बार फिर बाजी मार लेगा

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