जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर का खतरा बढ़ा, अब उसी IAS के हाथ में फैसला जिसे आज़म खान ने कभी कहा था ‘तनखैया’

The Red Ink
रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई के केंद्र में है। 38 इमारतों को ध्वस्त करने के आदेश के बाद अब मामला ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अंतिम फैसला उसी आईएएस अधिकारी के पास है, जिन पर कभी समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान ने सार्वजनिक मंच से विवादित टिप्पणी की थी। इस बीच विशेषज्ञों का कहना है कि यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए भारी आर्थिक और कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

अब किसके हाथ में है जौहर यूनिवर्सिटी का भविष्य?
रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की ओर से 15 जुलाई को यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया गया। इस आदेश के खिलाफ अपील का अधिकार मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आन्जनेय सिंह के पास है, जो वर्तमान में RDA के अध्यक्ष भी हैं। यही वह अधिकारी हैं, जिनके बारे में 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान आज़म खान ने विवादित टिप्पणी करते हुए उन्हें “तनखैया” कहा था।

यूनिवर्सिटी बचानी है तो करोड़ों की कीमत चुकानी पड़ सकती है
शहरी नियोजन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार यदि आज़म खान यूनिवर्सिटी की इमारतों को नियमित (रेगुलराइज) कराना चाहते हैं, तो उन्हें विकास शुल्क, कंपाउंडिंग फीस, लेबर सेस और अन्य वैधानिक शुल्क मिलाकर लगभग 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक का भुगतान करना पड़ सकता है। हालांकि अंतिम राशि भवनों के कुल क्षेत्रफल, परियोजना लागत और अन्य तकनीकी मानकों के आकलन के बाद ही तय होगी।

ध्वस्तीकरण से बचने के सामने हैं तीन विकल्प
विशेषज्ञों के मुताबिक आज़म खान के सामने फिलहाल तीन प्रमुख रास्ते हैं- पहला सभी इमारतों के नक्शे रामपुर विकास प्राधिकरण से मंजूर कराकर उन्हें वैध कराया जाए। दूसरा ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाए। हालांकि नक्शों की मंजूरी अंततः RDA से ही लेनी होगी और तीसरा RDA के अध्यक्ष एवं मंडलायुक्त के समक्ष अपील कर आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया जाए।

समय रहते नक्शे पास नहीं कराना पड़ा भारी
जानकारी के मुताबिक जिस सींगनखेड़ी गांव में जौहर यूनिवर्सिटी स्थित है, उसे मार्च 2026 में रामपुर विकास प्राधिकरण की सीमा में शामिल किया गया। इससे पहले यह क्षेत्र जिला पंचायत के अधीन था, जहां विकास शुल्क अपेक्षाकृत काफी कम था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उस समय भवनों के नक्शे मंजूर करा लिए जाते, तो प्रक्रिया कहीं अधिक आसान और कम खर्चीली होती।

नक्शा पास कराने के लिए पूरी करनी होगी लंबी प्रक्रिया
यदि यूनिवर्सिटी को नियमित कराने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो पहले निवेश मित्र पोर्टल के माध्यम से कई विभागों से आवश्यक एनओसी लेनी होगी। इसके बाद अधिकृत आर्किटेक्ट के जरिए RDA में आवेदन देना होगा। इसके साथ विकास शुल्क, लेबर सेस, कंपाउंडिंग फीस और अन्य निर्धारित शुल्क भी जमा कराने होंगे।

ग्रीन बेल्ट और लैंड यूज बन सकते हैं सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नक्शा मंजूरी ही पर्याप्त नहीं होगी। यह भी देखा जाएगा कि जिस भूमि पर यूनिवर्सिटी बनी है उसका लैंड यूज शैक्षणिक गतिविधियों के अनुरूप है या नहीं। यदि जमीन ग्रीन बेल्ट या किसी अन्य प्रतिबंधित श्रेणी में पाई गई, तो मामला और जटिल हो सकता है, क्योंकि ऐसे मामलों में केवल विकास प्राधिकरण नहीं बल्कि शासन स्तर पर भी मंजूरी आवश्यक होती है।

2019 का ‘तनखैया’ विवाद फिर चर्चा में
लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान प्रचार सभा में आज़म खान ने तत्कालीन जिलाधिकारी आन्जनेय सिंह पर टिप्पणी करते हुए उन्हें “तनखैया” कहा था और विवादित बयान दिया था। उसी मामले में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। बाद में अदालत ने इस मामले में आज़म खान को दोषी ठहराते हुए सजा भी सुनाई थी। अब छह साल बाद वही अधिकारी उस अपील की सुनवाई की स्थिति में हैं, जो जौहर यूनिवर्सिटी के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

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