Middle East War: ईरान के साथ जारी टकराव के बीच अब अमेरिका के सामने युद्ध का खर्च बड़ा सवाल बनता दिख रहा है। 30 दिन से जारी इस संघर्ष के बीच व्हाइट हाउस की ओर से आए संकेत बताते हैं कि वॉशिंगटन अब अपने सहयोगी अरब देशों की ओर आर्थिक मदद के लिए देख सकता है।
व्हाइट हाउस का इशारा: क्या अरब देशों से मांगा जाएगा खर्च?
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी Karoline Leavitt ने 30 मार्च को मीडिया से बातचीत में संकेत दिया कि राष्ट्रपति Donald Trump अरब देशों को युद्ध खर्च में शामिल करने के विचार में रुचि रखते हैं। एक पत्रकार ने 1990-91 के Gulf War का जिक्र करते हुए पूछा कि उस समय सऊदी अरब, कुवैत और यूएई जैसे देशों ने बड़ा खर्च उठाया था क्या इस बार भी ऐसा होगा?
इस पर लीविट ने कहा, “यह एक ऐसा आइडिया है जिसमें राष्ट्रपति दिलचस्पी ले रहे हैं और आप इस बारे में उनसे और सुनेंगे।” उनके इस बयान ने साफ संकेत दिया कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों से आर्थिक भागीदारी की उम्मीद कर सकता है।
ईरान का सख्त रुख: ‘मुआवजा मिले बिना नहीं रुकेगी लड़ाई’
दूसरी तरफ ईरान ने अपने रुख को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई है। Mohsen Rezaee ने साफ कहा है कि तेहरान तब तक पीछे नहीं हटेगा जब तक उसे अपने नुकसान का पूरा मुआवजा, आर्थिक प्रतिबंधों से राहत और अंतरराष्ट्रीय कानूनी गारंटी नहीं मिल जाती। उनके मुताबिक, “यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हमारी शर्तें पूरी नहीं होतीं।” यह बयान इस बात का संकेत है कि वेस्ट एशिया का यह संघर्ष जल्दी खत्म होता नहीं दिख रहा।
बातचीत जारी, लेकिन भरोसा कम
जहां एक तरफ ईरान सार्वजनिक रूप से सख्त रुख दिखा रहा है, वहीं White House का दावा है कि पर्दे के पीछे बातचीत जारी है। लीविट ने कहा कि मध्यस्थों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच “अच्छी बातचीत” हो रही है, भले ही सार्वजनिक बयान कुछ और कह रहे हों। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा ईरानी नेतृत्व बातचीत में पहले से ज्यादा “व्यावहारिक” हो सकता है।
अगर बातचीत फेल हुई तो क्या? पेंटागन तैयार
लीविट के मुताबिक, Pentagon राष्ट्रपति के लिए कई विकल्प तैयार कर रहा है। अगर बातचीत नाकाम रहती है तो इन विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मतलब साफ है एक तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखा गया है, तो दूसरी तरफ सैन्य विकल्प भी तैयार हैं।
वेस्ट एशिया में बढ़ती जटिलता
इस पूरे घटनाक्रम ने वेस्ट एशिया की राजनीति को और जटिल बना दिया है। एक तरफ ईरानी मिसाइल हमलों का दबाव झेल रहे अरब देश हैं, तो दूसरी तरफ अब उन पर संभावित आर्थिक बोझ का भी खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका की रणनीति अगर सहयोगी देशों से खर्च साझा कराने की दिशा में बढ़ती है, तो इससे क्षेत्रीय समीकरणों पर बड़ा असर पड़ सकता है।




