कौन हैं जस्टिस सुभाष विद्यार्थी? राहुल गांधी केस से अलग होने के पीछे क्या है पूरा मामला

The Red Ink
कांग्रेस नेता Rahul Gandhi की कथित दोहरी नागरिकता से जुड़े मामले में सोमवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब Allahabad High Court की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस Subhash Vidyarthi ने खुद को इस केस की सुनवाई से अलग कर लिया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस विद्यार्थी ने कहा कि उनके साथ गलत बर्ताव हुआ है। इसके बाद उन्होंने मामले को आगे सुनने से इनकार करते हुए फाइल चीफ जस्टिस को भेजने का निर्देश दिया, ताकि नई बेंच गठित की जा सके।

सोशल मीडिया पोस्ट से बढ़ा विवाद
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ याचिकाकर्ता S. Vignesh Shishir द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर की गई टिप्पणियां मानी जा रही हैं। दरअसल, 17 अप्रैल को हुई सुनवाई में कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को लेकर संकेत दिया था। लेकिन अगले ही दिन, कानूनी प्रक्रिया और पुराने फैसलों की समीक्षा के बाद जस्टिस विद्यार्थी ने अपना रुख बदला और कहा कि बिना नोटिस दिए इस तरह का आदेश देना उचित नहीं होगा। इस बदलाव के बाद याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर की और जज के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हुए भ्रष्टाचार के आरोप तक लगाए। कोर्ट ने इन टिप्पणियों को गंभीरता से लिया।

‘निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी’
सुनवाई के दौरान जज और याचिकाकर्ता के बीच तीखी बहस भी हुई। जस्टिस विद्यार्थी ने स्पष्ट किया कि इस स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसी आधार पर उन्होंने खुद को केस से अलग करना बेहतर समझा।

क्या है पूरा मामला?
यह याचिका राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर दायर की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि 2005-06 में एक ब्रिटिश कंपनी के दस्तावेजों में राहुल गांधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया था, जो भारतीय कानूनों का उल्लंघन हो सकता है। हालांकि, इससे पहले भी यह मुद्दा उठ चुका है। साल 2019 में Supreme Court of India की बेंच, जिसकी अगुवाई तत्कालीन चीफ जस्टिस Ranjan Gogoi कर रहे थे, इस तरह की याचिका खारिज कर चुकी है। कोर्ट ने तब कहा था कि किसी कंपनी के रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने मात्र से नागरिकता साबित नहीं होती।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का प्रोफाइल
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का जन्म 30 अप्रैल 1970 को हुआ। उन्होंने University of Lucknow से 1993 में कानून की पढ़ाई पूरी की और 1994 से वकालत शुरू की। लखनऊ में लंबे समय तक सिविल मामलों में प्रैक्टिस करने के बाद उन्हें 13 अक्टूबर 2021 को एडिशनल जज बनाया गया। इसके बाद 13 मार्च 2023 को वे स्थायी जज बने। वर्तमान में वे बाराबंकी जिले के एडमिनिस्ट्रेटिव जज भी हैं और उनका कार्यकाल 29 अप्रैल 2032 तक निर्धारित है।

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