The Red Ink:
मौजूदा स्थिति में 190 से 205 सीटों पर सिमटने का अनुमान, बहुमत के 202 के आंकड़े के आसपास फंसी दिख रही पार्टी…
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के एक आंतरिक सर्वे ने पार्टी के लिए चिंता बढ़ा दी है। सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार, अगर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विधानसभा चुनाव होते हैं तो भाजपा को 52 से 67 सीटों तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। रिपोर्ट में पार्टी के 190 से 205 सीटों के बीच रहने का अनुमान जताया गया है।
उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए कम से कम 202 सीटों की जरूरत होती है। ऐसे में सर्वे के अनुमान के अनुसार भाजपा बहुमत के आंकड़े के आसपास संघर्ष करती नजर आ रही है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीती थीं। बाद में उपचुनाव में दो सीटें और जुड़ने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या 257 हो गई।
एंटी-इनकम्बेंसी से निपटने के लिए 30 से 35% विधायकों के टिकट बदलने का सुझाव
सर्वे रिपोर्ट में पार्टी को संभावित नुकसान से बचाने के लिए उम्मीदवारों में बड़े बदलाव की सलाह दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के करीब 30 से 35 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी सामने आई है।
सर्वे करने वाली टीम का सुझाव है कि अगर भाजपा अपने मौजूदा 257 विधायकों में से करीब एक-तिहाई के टिकट बदलती है, तो स्थानीय एंटी-इनकम्बेंसी के असर को कम किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उम्मीदवारों के चयन, जातीय समीकरण और चुनाव से ठीक पहले बनने वाले राजनीतिक मुद्दों के आधार पर सीटों के अनुमान में करीब 10 प्रतिशत का उतार-चढ़ाव संभव है।
पूर्वांचल के कई क्षेत्रों में विधायकों की कार्यशैली और स्थानीय मौजूदगी को लेकर अपेक्षाकृत अधिक असंतोष दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
मार्च से जुलाई तक विधानसभा क्षेत्रों में जुटाया गया फीडबैक
भाजपा ने विधानसभा चुनाव की तैयारियों के तहत नेशन विद नमो नाम की एक रजिस्टर्ड एजेंसी से यह सर्वे कराया। यह एजेंसी भाजपा के लिए राजनीतिक सर्वे और जनमत से जुड़ा आकलन करती है।
सर्वे में शामिल विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की टीम ने मार्च से जुलाई के दूसरे सप्ताह तक प्रदेश के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में जाकर तय सैंपल के आधार पर लोगों से फीडबैक लिया।
सर्वे के दौरान मतदाताओं से मौजूदा विधायकों के कामकाज और छवि, स्थानीय समस्याओं, सरकारी योजनाओं की पहुंच, क्षेत्र के जातीय समीकरण और संभावित उम्मीदवारों को लेकर सवाल किए गए। लोगों से भाजपा और विपक्ष के संभावित चेहरों पर भी राय ली गई।
सर्वे में दो स्तरों पर दिखी नाराजगी
रिपोर्ट में जनता के असंतोष को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया। पहला हिस्सा केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों तथा कुछ घटनाओं को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया से जुड़ा था। दूसरा हिस्सा स्थानीय विधायकों के कामकाज और उनकी छवि को लेकर दर्ज नाराजगी का था।
सरकार से जुड़े मुद्दों में UGC के नए नियमों को लेकर अलग-अलग वर्गों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। दलित, पिछड़े और अन्य वंचित वर्गों के कुछ छात्रों ने शिकायतों की सुनवाई के लिए समिति बनाने से जुड़े प्रावधान को रोकने पर असहमति जताई। वहीं, सामान्य वर्ग के कुछ लोगों ने आशंका व्यक्त की कि इससे उनके बच्चों के लिए कॉलेजों का माहौल असुरक्षित हो सकता है।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी और प्रशासनिक सुनवाई पर भी सवाल
सर्वे के दौरान राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी से जुड़े मामले को लेकर अवध और पूर्वांचल के कुछ भाजपा समर्थकों में नाराजगी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, लोग सीधे तौर पर भाजपा को इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा रहे थे, लेकिन उनका मानना था कि ऐसी घटना को रोका जा सकता था।
थाना और तहसील स्तर पर शिकायतों की सुनवाई में देरी का मुद्दा भी सामने आया। आम लोगों के साथ-साथ कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी अपनी समस्याओं पर समय से कार्रवाई न होने की बात कही। कई लोगों का मानना था कि सरकारी योजनाओं का लाभ अब भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है।
NEET पेपर लीक और E-20 पेट्रोल को लेकर भी असंतोष
सर्वे में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक से जुड़े मामलों पर भी लोगों ने चिंता जताई। कई परिवारों ने कहा कि परीक्षाओं में गड़बड़ियों की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं और इन्हें रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। उनका मानना था कि केवल किसी आयोग को जिम्मेदार ठहराकर सरकार अपनी जवाबदेही से अलग नहीं हो सकती।
पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत किए जाने के फैसले को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, कई लोगों ने माइलेज कम होने और वाहनों के इंजन पर संभावित असर के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को जिम्मेदार ठहराया।
विधायकों के खिलाफ किन वजहों से दिखा असंतोष?
सर्वे में कुछ विधायकों को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की शिकायतें सामने आईं। लोगों का कहना था कि कई विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त सक्रिय नहीं हैं और विकास कार्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
कुछ विधायकों की छवि ठेका, पट्टा और खनन जैसे मामलों से जुड़ने के कारण प्रभावित होने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई। सर्वे टीम के अनुसार, स्थानीय नाराजगी का असर विधानसभा चुनाव में सीधे सीटों के नतीजों पर पड़ सकता है।
पुराने चेहरों को दोहराने पर दूसरे विकल्प की चेतावनी
सर्वे के दौरान कुछ मतदाताओं ने यह भी कहा कि यदि विधानसभा चुनाव में भी पुराने और स्थानीय स्तर पर अलोकप्रिय चेहरों को दोबारा टिकट दिया गया, तो वे दूसरे राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि उम्मीदवारों में बदलाव कर भाजपा स्थानीय स्तर पर बनी नाराजगी को कम कर सकती है। इससे पार्टी के लिए बहुमत का आंकड़ा पार करने की संभावना मजबूत हो सकती है।
2022 में भी भाजपा ने बड़ी संख्या में बदले थे उम्मीदवार
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी भाजपा ने दो एजेंसियों से सर्वे कराया था। उस समय सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पार्टी ने 120 से अधिक मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे।
भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों में से 165 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे थे। इसके बावजूद पार्टी की सीटें वर्ष 2017 के 312 के आंकड़े से घटकर 255 रह गई थीं। यानी भाजपा को 57 सीटों का नुकसान हुआ था।
धर्म, राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था पर फोकस से मिल सकता है फायदा
सर्वे टीम का मानना है कि अगर विधानसभा चुनाव का मुख्य विमर्श धर्म, राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों के आसपास रहा, तो भाजपा को राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
वहीं, यदि समाजवादी पार्टी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह जातीय समीकरण और PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—की राजनीति को प्रभावी ढंग से चुनावी मुद्दा बनाने में सफल रही, तो भाजपा के लिए चुनौती बढ़ सकती है।
नई पीढ़ी में यादव बनाम गैर-यादव की सोच कमजोर पड़ने का दावा
सर्वे टीम के एक सदस्य के अनुसार, यादव समुदाय को लंबे समय से समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता रहा है। सपा सरकार के दौरान कुछ मामलों में यादव समुदाय की सुनवाई जल्दी होने की धारणा के कारण गैर-यादव वर्गों में असंतोष देखने को मिलता था।
हालांकि, पिछले पांच वर्षों में यह नाराजगी कम होने का दावा किया गया है। खासतौर पर नई पीढ़ी या Gen Z के बीच यादव बनाम गैर-यादव की राजनीतिक सोच को पहले की तुलना में कम स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है।
भाजपा संगठन के बाद योगी सरकार भी करा रही अलग सर्वे
भाजपा संगठन का आंतरिक सर्वे पूरा हो चुका है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से भी अलग स्तर पर जनमत सर्वे कराया जा रहा है।
इस सर्वे के लिए एक निजी एजेंसी गांव-गांव जाकर सरकार के कामकाज, स्थानीय विधायकों की छवि और मुख्यमंत्री के प्रति लोगों की राय से जुड़ा फीडबैक जुटा रही है। माना जा रहा है कि दोनों सर्वे के निष्कर्ष आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति और उम्मीदवारों के चयन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।




