The Red Ink
तमिलनाडु की राजनीति में अनिश्चितता खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। विजय की अगुवाई वाली TVK सरकार बनाने के करीब पहुंचकर भी बहुमत साबित नहीं कर पा रही है, जिससे एक बार फिर शपथ ग्रहण टल गया है।
बहुमत से दो कदम दूर अटकी सरकार
राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर से मुलाकात कर विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन उनके पास सिर्फ 116 विधायकों का समर्थन ही जुट पाया। जबकि सरकार बनाने के लिए 118 का आंकड़ा जरूरी है। TVK को कांग्रेस, CPI और CPI(M) का समर्थन मिला है, लेकिन IUML और VCK की तरफ से आधिकारिक समर्थन पत्र अभी तक नहीं दिया गया। यही वजह है कि सरकार गठन की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।
VCK के समर्थन पर बना असमंजस
VCK प्रमुख थिरुमावलवन ने सार्वजनिक तौर पर समर्थन की बात जरूर कही, लेकिन देर रात तक राज्यपाल को कोई औपचारिक पत्र नहीं सौंपा गया। इससे सियासी समीकरण और उलझ गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, राज्यपाल स्पष्ट बहुमत के बिना सरकार गठन की अनुमति देने के मूड में नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
सरकार बनाने में देरी के बाद TVK ने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया है। पार्टी की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे आमंत्रित न करना संवैधानिक परंपराओं के खिलाफ है।
चुनाव के बाद क्या-क्या हुआ?
4 मई: चुनाव नतीजों में TVK 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी
5 मई: सहयोगी दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश शुरू
6-7 मई: राज्यपाल से मुलाकात, लेकिन बहुमत पूरा न होने पर इंतजार
8 मई: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
9 मई: शपथ ग्रहण फिर टला
कांग्रेस विधायकों की ‘सुरक्षा रणनीति’
राजनीतिक जोड़-तोड़ की आशंका के बीच कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों को हैदराबाद भेज दिया है। इसे संभावित टूट-फूट से बचाने की रणनीति माना जा रहा है।
क्या 59 साल बाद बनेगी तीसरी सरकार?
तमिलनाडु में 1967 के बाद पहली बार ऐसा मौका आया है, जब DMK और AIADMK के अलावा किसी तीसरी पार्टी की सरकार बन सकती है। हालांकि मौजूदा हालात में यह रास्ता आसान नहीं दिख रहा।
सियासी खींचतान के बीच आरोप-प्रत्यारोप
AMMK नेता टीटीवी दिनाकरन ने TVK पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगाए हैं, जबकि दूसरी तरफ DMK नेताओं का कहना है कि अगर विजय अकेले दावा करते तो स्थिति अलग हो सकती थी।
आगे क्या?
अब नजर VCK और अन्य सहयोगी दलों के रुख पर टिकी है। अगर समर्थन पत्र जल्द नहीं आता, तो राज्य में राजनीतिक गतिरोध और लंबा खिंच सकता है।




