The Red Ink
एक दौर था जब भारतीय रुपया एशिया की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदम मिलाकर चलता दिखाई देता था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। देश की जीडीपी बढ़ रही है, हाईवे बन रहे हैं, डिजिटल इंडिया की चर्चा दुनिया में हो रही है, फिर भी डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। दूसरी तरफ मलेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर और यहां तक कि पाकिस्तान जैसी अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं भी स्थिर या मजबूत होती दिख रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत का रुपया दबाव में क्यों है?
12 साल में रुपया कितना टूटा?
जब नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब एक डॉलर की कीमत करीब 59 रुपए थी। दूसरे कार्यकाल तक पहुंचते-पहुंचते रुपया 69 के पार चला गया। तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में डॉलर लगभग 83 रुपए का हो चुका था और अब हालात यह हैं कि डॉलर करीब 96 रुपए के स्तर तक पहुंच गया है। यानी पिछले 12 वर्षों में भारतीय मुद्रा में 60 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई है। हालांकि यह गिरावट केवल मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं है। इससे पहले मनमोहन सिंह सरकार के दौरान भी रुपया कमजोर हुआ था, लेकिन मौजूदा समय में गिरावट की रफ्तार और वैश्विक तुलना ज्यादा चर्चा में है।
सवाल ये है—अर्थव्यवस्था बढ़ रही तो रुपया क्यों गिर रहा?
आर्थिक जानकारों का मानना है कि सामान्य तौर पर जिस देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है, उसकी मुद्रा भी मजबूत होती है। भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद रुपया कमजोर हो रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कई अर्थशास्त्रियों ने इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि केवल विकास दर मजबूत होना काफी नहीं होता। विदेशी निवेश, व्यापार संतुलन, डॉलर की मांग और आयात पर निर्भरता भी मुद्रा की ताकत तय करती है।
डॉलर क्यों खींच ले जाता है रुपया?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ते ही भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया दबाव में आ जाता है। हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने भी असर डाला—अमेरिका की सख्त आर्थिक नीतियां, वैश्विक व्यापार तनाव, पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति, विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसा निकालना, आयात खर्च में तेजी। इन वजहों से भारतीय बाजार से डॉलर बाहर गया और रुपया कमजोर होता चला गया।

मलेशिया की करेंसी आखिर कैसे चमक गई?
जहां भारत का रुपया दबाव में रहा, वहीं मलेशिया की मुद्रा रिंगिट ने शानदार वापसी की। पिछले साल रिंगिट एशिया की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रही। विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कुछ बड़े कारण रहे—मजबूत करंट अकाउंट सरप्लस, विदेशी निवेश में तेजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्री सेक्टर में उछाल, चीन और यूरोप के साथ बेहतर व्यापारिक रिश्ते, स्थिर कारोबारी माहौल। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ने से मलेशिया की मुद्रा को बड़ा सहारा मिला।

थाईलैंड की मुद्रा क्यों मजबूत हुई?
थाईलैंड का बाट भी डॉलर के मुकाबले मजबूती दिखाने वाली एशियाई मुद्राओं में शामिल रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां का निर्यात माना जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर और अमेरिका के साथ बढ़ता व्यापार थाई अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है। साथ ही थाईलैंड लगातार व्यापार अधिशेष यानी Export ज्यादा और Import कम की स्थिति में बना हुआ है। यही वजह है कि वहां की मुद्रा पर दबाव कम है।

चीन ने कैसे संभाला युआन?
चीन की मुद्रा युआन लंबे समय से वैश्विक चर्चा में रहती है। अमेरिका और यूरोप कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि चीन अपनी मुद्रा को जानबूझकर कमजोर रखता है ताकि उसका निर्यात सस्ता बना रहे। इसके बावजूद हाल के महीनों में युआन ने डॉलर के मुकाबले मजबूती दिखाई। चीन की मैन्युफैक्चरिंग ताकत, भारी निर्यात और सेंट्रल बैंक के आक्रामक हस्तक्षेप ने उसकी करेंसी को सपोर्ट दिया।

सिंगापुर को AI बूम का फायदा
सिंगापुर की अर्थव्यवस्था को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक सेक्टर से बड़ा फायदा मिला है। वहां इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में जबरदस्त तेजी आई। AI से जुड़ी इंडस्ट्रीज ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया और इससे सिंगापुर डॉलर मजबूत हुआ।

पाकिस्तान का रुपया भी कैसे टिक गया?
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि आर्थिक संकटों से जूझ रहे पाकिस्तान का रुपया भी हाल के महीनों में अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई दिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कुछ अस्थायी वजहें रहीं—सऊदी अरब और खाड़ी देशों से वित्तीय मदद, विदेशी फंडिंग, रेमिटेंस में बढ़ोतरी, आयात नियंत्रण, डॉलर की सीमित मांग हालांकि अर्थशास्त्री इसे स्थायी मजबूती नहीं मानते।
कमजोर रुपया आम आदमी को कैसे प्रभावित करता है?
रुपये की गिरावट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होती। इसका असर सीधे लोगों की जेब पर पड़ता है।
महंगाई बढ़ती है-
तेल महंगा होता है तो पेट्रोल-डीजल से लेकर ट्रांसपोर्ट तक सब महंगा हो जाता है। गैस सिलेंडर, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों तक की कीमत बढ़ सकती है।
विदेश पढ़ाई और यात्रा महंगी-
डॉलर महंगा होने का मतलब है कि विदेश में पढ़ाई, इलाज और घूमना ज्यादा खर्चीला हो जाता है।
विदेशी निवेश घटता है-
जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाता है। वे पैसा निकालने लगते हैं।
लेकिन कमजोर रुपये का फायदा भी है
हर नुकसान के साथ कुछ फायदे भी जुड़े होते हैं। भारतीय सामान विदेशों में सस्ते पड़ते हैं, Export बढ़ सकता है, विदेश में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसों की वैल्यू बढ़ जाती है, IT और सर्विस सेक्टर को फायदा मिलता है। भारत को सालाना अरबों डॉलर की रेमिटेंस मिलती है और कमजोर रुपया उन परिवारों के लिए राहत बनता है जो विदेश से पैसा प्राप्त करते हैं।
आखिर आगे क्या?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रुपया केवल सरकार या रिजर्व बैंक के फैसलों से नहीं चलता। वैश्विक राजनीति, तेल बाजार, विदेशी निवेश और व्यापार संतुलन भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर भारत को रुपया मजबूत करना है तो सिर्फ विकास दर नहीं, बल्कि Export बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और डॉलर आउटफ्लो रोकना भी जरूरी होगा।




