The Red Ink
दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक समय तक चले जेन-ज़ी आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रदर्शनकारियों की बड़ी राजनीतिक और प्रतीकात्मक जीत के तौर पर देखा गया। आंदोलन के दौरान शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठे थे।
हालांकि, धर्मेंद्र प्रधान के पद छोड़ने के अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी वरिष्ठ भाजपा नेता प्रल्हाद जोशी को सौंप दी। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या सरकार ने सिर्फ शिक्षा मंत्री का चेहरा बदला है या शिक्षा नीति और उसकी बुनियादी दिशा में भी किसी बदलाव के संकेत हैं।
प्रल्हाद जोशी और धर्मेंद्र प्रधान दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं। ऐसे में विपक्ष और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इस नियुक्ति को सरकार की नीतिगत निरंतरता के संकेत के रूप में देखा है।
राहुल और प्रियंका गांधी ने उठाया पुराना मुद्दा
प्रल्हाद जोशी के शिक्षा मंत्री बनने के बाद उनसे जुड़ा बिलकिस बानो मामला भी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया। संसद परिसर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रल्हाद जोशी ने एक गर्भवती महिला के साथ दुष्कर्म के दोषियों की रिहाई का समर्थन किया था। इससे पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी लोकसभा में इसी मुद्दे को उठाया था। बाद में उनकी टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया था।
प्रियंका गांधी के बयान पर भाजपा नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई। इसके जवाब में प्रल्हाद जोशी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं को अपने दावों के समर्थन में सबूत पेश करने चाहिए।
जोशी ने कहा था कि उनके बारे में गलत जानकारी दी जा रही है और बिना तथ्यों के किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं है।
बिलकिस बानो मामले में प्रल्हाद जोशी ने क्या कहा था?
गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों को वर्ष 2022 में समय से पहले रिहा कर दिया गया था। इस फैसले को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी।
उस समय प्रल्हाद जोशी केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर 2022 में उन्होंने दोषियों की रिहाई को कानूनी प्रक्रिया के दायरे में बताया था।
उन्होंने कहा था कि यदि सरकार और संबंधित अधिकारियों ने कानून के तहत फैसला लिया है तो उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं दिखता। जोशी का तर्क था कि लंबे समय तक जेल में रहने वाले कैदियों की समय से पहले रिहाई के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।
उन्होंने यह भी कहा था कि अच्छे आचरण के आधार पर कैदियों की रिहाई का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि अपराध करने वाले व्यक्ति को उसके अपराध की सजा मिलनी चाहिए।
रिहाई के फैसले पर क्यों उठा था विवाद?
दोषियों की रिहाई को लेकर कई सामाजिक संगठनों, विपक्षी दलों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए थे। मीडिया में आई जानकारी के अनुसार, गुजरात सरकार की ओर से अदालत में दाखिल दस्तावेजों में यह बात सामने आई थी कि रिहाई की प्रक्रिया के दौरान कुछ गंभीर आपत्तियों पर भी विचार किया गया था।
मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने दोषियों को दी गई समयपूर्व रिहाई को रद्द कर दिया था और उन्हें दोबारा जेल भेजने का आदेश दिया था। अब प्रल्हाद जोशी के शिक्षा मंत्री बनने के बाद कांग्रेस उनके पुराने बयान को राजनीतिक मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि जोशी ने दोषियों के अपराध का समर्थन नहीं किया था, बल्कि केवल कानूनी प्रक्रिया पर अपनी राय रखी थी।
BJP ने प्रियंका गांधी के आरोपों को बताया भ्रामक
भाजपा ने प्रियंका गांधी की टिप्पणी को भ्रामक और आधारहीन बताया है। पार्टी के मीडिया सेल से जुड़े नेता और लोकसभा सांसद अनिल बलूनी ने कहा कि संसद के भीतर किसी केंद्रीय मंत्री के खिलाफ बिना पर्याप्त तथ्यों के ऐसे आरोप लगाना उचित नहीं है।
भाजपा का कहना है कि प्रल्हाद जोशी ने बिलकिस बानो मामले के दोषियों के अपराध का समर्थन नहीं किया था। पार्टी के अनुसार, उन्होंने केवल समयपूर्व रिहाई से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का उल्लेख किया था।
भाजपा ने कांग्रेस पर राजनीतिक लाभ के लिए बयानों को संदर्भ से अलग करके पेश करने का आरोप भी लगाया है।
शिक्षा मंत्री के तौर पर प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति का राजनीतिक संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय सौंपकर भाजपा ने यह संकेत दिया है कि सरकार अपनी शिक्षा नीति की मूल दिशा में बदलाव करने के मूड में नहीं है।
इतिहासकार मुकुल केसवन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति को केवल व्यक्ति बदलने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जेन-ज़ी आंदोलन की सफलता मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है, क्योंकि एक मजबूत सरकार के सामने छात्रों के दबाव के बाद मंत्री का पद छोड़ना अपने आप में महत्वपूर्ण घटना है।
उन्होंने कहा कि भाजपा ने शिक्षा मंत्री का चेहरा बदला है, लेकिन इससे यह संकेत नहीं मिलता कि शिक्षा नीति की वैचारिक दिशा बदलेगी।
‘चेहरा बदला, लेकिन नीति नहीं’
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलनकारियों की मांगों को देखते हुए सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान को हटाकर राजनीतिक दबाव कम करने की कोशिश की, लेकिन प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय देकर यह संदेश भी दिया कि नीतिगत बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषक नीलांजन मुखोपाध्याय ने मीडिया से बातचीत में कहा कि नई नियुक्ति से यह सवाल उठता है कि सरकार युवाओं की मांगों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को कितनी गंभीरता से ले रही है।
उनका मानना है कि शिक्षा मंत्रालय में नई नियुक्तियों को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं और सरकार को इन मुद्दों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
जेन-ज़ी आंदोलन से जुड़े लोगों ने क्या कहा?
जेन-ज़ी आंदोलन में शामिल रहे राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी इस बदलाव को शिक्षा नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, जो लोग धर्मेंद्र प्रधान के जाने के बाद शिक्षा व्यवस्था में बड़े नीतिगत बदलाव की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति से सरकार का रुख समझ लेना चाहिए। उनका कहना है कि मंत्री बदलने से सरकार की पूरी नीति बदल जाएगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
शिक्षा मंत्रालय को लेकर क्यों अहम है यह नियुक्ति?
गुजरात यूनिवर्सिटी के पूर्व सामाजिक विज्ञान प्रोफेसर गौरांग जानी का मानना है कि भाजपा के लिए शिक्षा मंत्रालय केवल प्रशासनिक विभाग नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि शिक्षा के माध्यम से युवाओं की सोच, पाठ्यक्रम और भविष्य की सामाजिक दिशा पर प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम और पारंपरिक ज्ञान से जुड़े मुद्दों पर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। जानी ने यह भी कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात तो की जाती है, लेकिन कई भाषाओं में उच्च शिक्षा, शोध सामग्री और पर्याप्त संसाधनों की कमी अब भी बड़ी चुनौती है।
उनके अनुसार, शिक्षा नीति में बदलाव केवल मंत्री बदलने से नहीं होगा, क्योंकि बड़े नीतिगत फैसलों में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
क्या जेन-ज़ी आंदोलन की मांग पूरी हुई?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जेन-ज़ी आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि, प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाए जाने के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या सरकार ने केवल राजनीतिक दबाव के कारण चेहरा बदला है या शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार की दिशा में भी कदम उठाए जाएंगे।
फिलहाल, भाजपा का रुख यह संकेत देता है कि सरकार अपनी मौजूदा शिक्षा नीति पर कायम रहना चाहती है। दूसरी ओर, विपक्ष और आंदोलन से जुड़े लोग नई नियुक्ति को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि प्रल्हाद जोशी के कार्यकाल में परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, शिक्षा में जवाबदेही और छात्रों की मांगों पर सरकार क्या ठोस कदम उठाती है।




