The Red Ink
महिला आरक्षण को लेकर चल रही सियासी खींचतान के बीच बसपा प्रमुख Mayawati ने अपनी पार्टी के भीतर किसी भी तरह की “फ्रीलांस राजनीति” पर ब्रेक लगा दिया है। बुधवार को उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी का जो स्टैंड 15 अप्रैल को तय हुआ था, वही अंतिम है और इस मुद्दे पर कोई कार्यकर्ता सड़क पर उतरकर प्रदर्शन नहीं करेगा। उन्होंने X पर पोस्ट करते हुए कार्यकर्ताओं को सीधे निर्देश दिए कि बैठकों में पार्टी की आधिकारिक लाइन ही बताई जाए, ताकि बाहर कोई कन्फ्यूजन न फैले।
समर्थन है, लेकिन शर्त भी उतनी ही कड़ी
Mayawati ने दोहराया कि उनकी पार्टी महिलाओं को 33% आरक्षण देने के पक्ष में है, लेकिन इसके भीतर SC, ST और OBC महिलाओं के लिए अलग हिस्सेदारी तय करना जरूरी है। उनके मुताबिक अगर ऐसा नहीं हुआ, तो पूरा आरक्षण सिर्फ “कागज़ी संतुलन” बनकर रह जाएगा।
दूसरी पार्टियों पर तंज
उन्होंने बिना नाम लिए विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि कई पार्टियां सिर्फ मजबूरी में समर्थन दिखा रही हैं, जबकि असली मुद्दों से बच रही हैं। बसपा लंबे समय से महिलाओं को उनकी आबादी के हिसाब से 50% तक हिस्सेदारी देने की मांग करती रही है लेकिन इस पर कोई गंभीर चर्चा नहीं होती।
संगठन पर फोकस, आंदोलन से दूरी
मायावती ने साफ कर दिया कि इस वक्त प्राथमिकता सड़क पर नारेबाजी नहीं, बल्कि संगठन को मजबूत करना है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि गांव-गांव बैठकों में बसपा सरकार के दौरान हुए कामों जैसे एक्सप्रेस-वे और नोएडा एयरपोर्ट की प्लानिंग को लोगों तक पहुंचाएं।
राजनीतिक मैसेज साफ है
इस पूरे बयान से बसपा का इरादा साफ दिख रहा है पार्टी महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपनी लाइन बनाए रखना चाहती है लेकिन बिना भीड़ और प्रदर्शन के, पूरी तरह “कंट्रोल्ड पॉलिटिक्स” के साथ।




