India GDP Growth 7.8% रही, लेकिन आंकड़ों की व्याख्या पर बहस तेज…
भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में India GDP Growth के मामले में 7.8% की दर दर्ज की है। अप्रैल से जून के बीच दर्ज यह वृद्धि पिछले साल की इसी तिमाही में दर्ज 6.9% से अधिक है। हालांकि, जनवरी-मार्च तिमाही में 8.6% की वृद्धि के मुकाबले इस बार रफ्तार थोड़ी कम रही है।
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पहली तिमाही की वृद्धि दर ब्लूमबर्ग के 7.3% के औसत अनुमान और भारतीय रिजर्व बैंक के 7% के पूर्वानुमान से भी ऊपर रही। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर को इस प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाने वाला माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आंकड़े को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन से जुड़ी बाधाओं और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत ने मजबूत आर्थिक प्रदर्शन किया है।
मैन्युफैक्चरिंग से लेकर सेमीकंडक्टर तक पर जोर
भारत ऑटोमोबाइल, मोबाइल फोन, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स और स्टील जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ा रहा है। इसके साथ ही सरकार सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को भी बड़े पैमाने पर विकसित करने की कोशिश कर रही है।
हालांकि, अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी फिलहाल करीब 17% बताई जाती है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 25% तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार के साथ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ाना भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, जून तिमाही का प्रदर्शन
भारत को मार्च 2027 तक के 12 महीनों में 7% से अधिक की वृद्धि हासिल करने की दिशा में ले जा सकता है। हालांकि, 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के लिए इससे भी तेज और लगातार आर्थिक विस्तार की जरूरत होगी।
GDP बढ़ी, लेकिन चालू खाता घाटा भी बढ़ा
तेज आर्थिक वृद्धि के बीच भारत के चालू खाते के घाटे यानी करंट अकाउंट डेफिसिट में भी बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में यह बढ़कर 4.2 अरब डॉलर हो गया, जो GDP का करीब 0.5% है।
एक साल पहले इसी अवधि में चालू खाता घाटा 3.4 अरब डॉलर यानी GDP का 0.4% था।
India GDP Growth के आंकड़ों पर विपक्ष ने उठाए सवाल
7.8% की India GDP Growth को लेकर विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बेरोजगारी और महंगाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि GDP की तेज वृद्धि का फायदा आम लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच रहा है।
खड़गे ने बेरोजगारी, युवाओं के रोजगार और रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की कीमतों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उनका तर्क है कि आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों के साथ रोजगार और लोगों की आय की स्थिति को भी देखा जाना चाहिए।
पूर्व वित्त सचिव ने आंकड़ों के आधार पर जताई आपत्ति
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वित्त सचिव रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने भी GDP के आंकड़ों की व्याख्या पर सवाल उठाया है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि 7.8% की वृद्धि पहली नजर में प्रभावशाली दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे इस्तेमाल किए गए बेस और संशोधित आंकड़ों को समझना भी जरूरी है।
गर्ग के मुताबिक, पिछले साल की पहली तिमाही के मौजूदा कीमतों पर GDP के आंकड़े बाद में संशोधित किए गए। उनका दावा है कि पिछले वर्ष के नॉमिनल GDP बेस में बड़ी गिरावट के कारण इस साल की वृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे रही है।
उन्होंने कहा कि पिछले साल पहली तिमाही की मौजूदा कीमतों वाली GDP करीब 86 ट्रिलियन रुपये बताई गई थी, जिसे बाद में संशोधित करके लगभग 80 ट्रिलियन रुपये किया गया। गर्ग का कहना है कि इसी बदलाव के कारण मौजूदा वित्त वर्ष की GDP वृद्धि को देखने का नजरिया बदल जाता है।
गर्ग ने इस बात पर जोर दिया कि GDP के आंकड़ों को केवल एक प्रतिशत के रूप में देखने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि पिछले वर्षों के आंकड़ों में कितना संशोधन हुआ है और उसकी वजह क्या है।
आधार वर्ष बदलने से भी बदली GDP सीरीज
GDP के आंकड़ों को लेकर चर्चा के बीच नई GDP सीरीज भी महत्वपूर्ण है। सरकार ने 2026 में GDP के लिए आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया। इसके तहत वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के GDP अनुमानों तथा दूसरे संबंधित आंकड़ों की नई सीरीज जारी की गई।
आधार वर्ष का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में समय के साथ उत्पादन की तुलना करने के लिए बेंचमार्क के तौर पर किया जाता है। अर्थव्यवस्था की संरचना, कीमतों और खर्च के पैटर्न में बदलाव को देखते हुए समय-समय पर आधार वर्ष को अपडेट किया जाता है।
भारत में इससे पहले भी अलग-अलग वर्षों को GDP सीरीज के आधार वर्ष के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर पर भी बहस
भारत की अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक क्षेत्र की बड़ी भूमिका होने के कारण GDP मापन को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने भी आधिकारिक GDP वृद्धि के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।
उनका तर्क रहा है कि भारत के रोजगार का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है, जबकि GDP का अनुमान लगाने में इस्तेमाल होने वाले कई संकेतक औपचारिक अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
ऐसे में अगर कॉरपोरेट और औपचारिक क्षेत्र में तेजी हो, लेकिन छोटी कंपनियों, अनौपचारिक कारोबार और स्वरोजगार करने वाले लोगों पर आर्थिक दबाव बना रहे, तो पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिति को केवल औपचारिक क्षेत्र के संकेतकों से समझना मुश्किल हो सकता है।
अरुण कुमार ने GDP के आंकड़ों को बेहतर बनाने के लिए अनौपचारिक क्षेत्र के अधिक व्यापक सर्वे, नए और बेहतर सैंपल, कीमतों के मापन में सुधार तथा तिमाही और वार्षिक आंकड़ों के बीच ज्यादा पारदर्शिता की जरूरत बताई है।
आर्थिक तस्वीर को लेकर क्या समझना जरूरी है?
एक तरफ 7.8% की India GDP Growth भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार का संकेत देती है, वहीं दूसरी तरफ GDP के बेस ईयर, संशोधित आंकड़ों, रोजगार और अनौपचारिक क्षेत्र को लेकर उठ रहे सवाल इस तस्वीर को और जटिल बनाते हैं।
इसलिए GDP वृद्धि को समझने के लिए केवल एक तिमाही की प्रतिशत वृद्धि देखने के बजाय उत्पादन, रोजगार, महंगाई, निवेश, चालू खाता घाटा और अर्थव्यवस्था के औपचारिक-अनौपचारिक दोनों हिस्सों के प्रदर्शन को साथ में देखना जरूरी है।




