जौहर यूनिवर्सिटी बनी आजम खान की सबसे बड़ी सियासी भूल? रुतबे से लेकर रसूख तक कैसे बिखरता गया पूरा साम्राज्य

The Red Ink
कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा दौर था जब मोहम्मद आजम खान का नाम सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। रामपुर में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि प्रशासन से लेकर राजनीतिक गलियारों तक उनकी चर्चा होती थी। लेकिन जिस मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर खड़ा किया, वही आज उनके राजनीतिक पतन का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। जमीन विवाद, कानूनी मुकदमे, सरकारी जांच और अब ध्वस्तीकरण के आदेश ने इस पूरे मामले को नई दिशा दे दी है।

एक लाइब्रेरी से शुरू हुआ था यूनिवर्सिटी का सपना
आजम खान ने 1990 के दशक में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर एक शैक्षणिक संस्थान का सपना देखा था। वर्षों की तैयारी के बाद 2006 में जौहर यूनिवर्सिटी की आधारशिला रखी गई। बाद में इसे निजी विश्वविद्यालय का दर्जा मिला और आजम खान इसके आजीवन कुलाधिपति भी बने। समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान विश्वविद्यालय का तेजी से विस्तार हुआ। इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य कई पाठ्यक्रम शुरू हुए और हजारों छात्र यहां पढ़ने पहुंचे।

जमीन अधिग्रहण बना सबसे बड़ा विवाद
यूनिवर्सिटी के निर्माण के साथ ही जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद भी शुरू हो गया। कई किसानों ने आरोप लगाया कि उन पर जमीन बेचने का दबाव बनाया गया। बाद के वर्षों में सरकारी एजेंसियों ने जांच के दौरान यह भी दावा किया कि परिसर का एक बड़ा हिस्सा सरकारी, शत्रु संपत्ति और अन्य विवादित जमीन पर विकसित किया गया था। इन्हीं आरोपों के बाद कई मामलों में जांच शुरू हुई और भूमि से जुड़े विवाद अदालतों तक पहुंच गए।

सत्ता बदली और शुरू हुई कार्रवाई
2017 में उत्तर प्रदेश में सरकार बदलने के बाद जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामलों की जांच तेज हो गई। विश्वविद्यालय की जमीन, फंडिंग, भवन निर्माण और अन्य दस्तावेजों की जांच अलग-अलग एजेंसियों ने शुरू की। इसके बाद आजम खान और उनके परिवार पर कई मुकदमे दर्ज हुए। फर्जी दस्तावेजों से जुड़े मामलों में सजा के बाद उन्हें जेल भी जाना पड़ा और उनकी राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

‘तनखैया’ बयान अब बना मुश्किलों की वजह
2019 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान आजम खान ने तत्कालीन जिलाधिकारी आन्जनेय सिंह पर विवादित टिप्पणी की थी। इसी बयान को लेकर दर्ज हेट स्पीच मामले में उन्हें बाद में दो साल की सजा सुनाई गई। दिलचस्प बात यह है कि आज वही आन्जनेय सिंह रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के अध्यक्ष हैं और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े अपील मामलों पर अंतिम प्रशासनिक फैसला उनके स्तर पर होना है।

38 इमारतों पर ध्वस्तीकरण का आदेश
रामपुर विकास प्राधिकरण ने जुलाई 2026 में विश्वविद्यालय परिसर की 38 इमारतों को बिना स्वीकृत नक्शे के निर्मित बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया। प्राधिकरण का कहना है कि निर्माण नियमानुसार स्वीकृत नहीं कराया गया था। यदि विश्वविद्यालय को नियमित कराना है तो संबंधित नक्शों की स्वीकृति, विकास शुल्क, कंपाउंडिंग फीस, इम्पैक्ट फीस समेत कई कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।

100 करोड़ रुपये तक का आ सकता है खर्च
शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन सभी भवनों को नियमित कराने की प्रक्रिया अपनाता है तो विकास शुल्क, कंपाउंडिंग चार्ज, इम्पैक्ट फीस और अन्य देयों को मिलाकर राशि करीब 100 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि अंतिम रकम भवनों के वास्तविक क्षेत्रफल और तकनीकी आकलन के बाद ही तय होगी।

राजनीतिक असर भी पड़ा
कभी रामपुर की राजनीति में आजम खान का दबदबा निर्विवाद माना जाता था, लेकिन कानूनी मामलों और लगातार बढ़ती कार्रवाई के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति भी कमजोर होती चली गई। विधानसभा सदस्यता जाने से लेकर लोकसभा चुनावों में बदले समीकरण तक, जौहर यूनिवर्सिटी विवाद ने उनकी राजनीतिक यात्रा पर गहरा असर डाला। आज यह मामला केवल एक विश्वविद्यालय का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में से एक के उत्थान और पतन की कहानी भी बन चुका है।

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