Arun Jaitley Death Anniversary: अमित शाह से पहले PM Modi के सबसे भरोसेमंद साथी थे अरुण जेटली, तिहाड़ से सत्ता के शिखर तक ऐसा रहा सफर

Arun Jaitley Death Anniversary: 24 अगस्त 2019 को भारतीय राजनीति ने अपना एक बेहद प्रभावशाली चेहरा खो दिया था। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री, वरिष्ठ बीजेपी नेता और दिग्गज वकील Arun Jaitley का 66 वर्ष की उम्र में निधन हुआ था। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए उनकी उस राजनीतिक यात्रा पर नजर डालना जरूरी है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से शुरू होकर तिहाड़ जेल, संसद और केंद्र सरकार के सबसे अहम मंत्रालयों तक पहुंची। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में जेटली को प्रधानमंत्री के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों और सरकार के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में गिना जाता था। प्रधानमंत्री मोदी ने उनके निधन के बाद उन्हें अपना “valued friend” बताते हुए कहा था कि दशकों से उन्हें जानने का उन्हें सम्मान मिला।

तिहाड़ जेल से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

अरुण जेटली का राजनीति से जुड़ाव किसी पारंपरिक राजनीतिक परिवार की विरासत के सहारे नहीं हुआ था। 1975 में जब देश में आपातकाल लगा, उस समय वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे।

25 जून 1975 की रात पुलिस उनके घर पहुंची। जेटली पुलिस की गिरफ्तारी से बचते हुए घर से निकल गए और अगले दिन छात्रों को जुटाकर विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

तिहाड़ में उनकी मुलाकात उस दौर के कई बड़े विपक्षी नेताओं से हुई। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और केआर मलकानी जैसे नेताओं के साथ जेल में बिताया समय उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय करने वाला दौर साबित हुआ।

यही वह समय था, जब एक छात्र नेता के भीतर राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा आकार लेने लगा।

वकील बने और संसद की राजनीति में छा गए

जेटली ने कानून की पढ़ाई पूरी की और आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बने। उनकी कानूनी समझ और शानदार वक्तृत्व क्षमता ने उन्हें बीजेपी के भीतर तेजी से स्थापित किया।

1989 में वीपी सिंह सरकार के दौरान उन्हें भारत का अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बनाया गया। बोफोर्स मामले की जांच से जुड़े काम में भी उन्होंने अधिकारियों के साथ विदेशों का दौरा किया।

बाद में लालकृष्ण आडवाणी से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी मामलों में भी उन्होंने पैरवी की। जैन हवाला मामले में आडवाणी के बचाव में उनकी भूमिका ने पार्टी के भीतर उनके कद को और मजबूत किया।

मोदी के लिए बने भरोसेमंद रणनीतिकार

Arun Jaitley के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय नरेंद्र मोदी के साथ उनके संबंधों से जुड़ा रहा।

1990 के दशक में नरेंद्र मोदी दिल्ली की राजनीति में बीजेपी के संगठनात्मक कामकाज में सक्रिय हुए तो जेटली के साथ उनकी नजदीकी बढ़ी। दोनों के बीच राजनीतिक मुद्दों पर लगातार संवाद रहा।

समय के साथ यह रिश्ता महज पार्टी के दो नेताओं का संबंध नहीं रहा, बल्कि मोदी के राजनीतिक सफर में जेटली भरोसेमंद सलाहकारों में शामिल हो गए।

प्रधानमंत्री मोदी ने जेटली के निधन पर उन्हें अपना करीबी मित्र बताते हुए कहा था कि उनके मुद्दों की बारीक समझ का कोई मुकाबला नहीं था।

2014 में चुनाव हारकर भी मिली बड़ी जिम्मेदारी

2014 के लोकसभा चुनाव में अरुण जेटली अमृतसर से चुनाव हार गए थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार में उनकी भूमिका पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

उन्हें वित्त मंत्रालय जैसी बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। इसके साथ ही उन्होंने रक्षा मंत्रालय का भी दायित्व संभाला।

सरकार के बड़े आर्थिक फैसलों और संसद में उनकी प्रभावी मौजूदगी ने उन्हें मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया। उन्हें अक्सर सरकार का chief troubleshooter भी माना जाता था।

GST और नोटबंदी के दौर में निभाई बड़ी भूमिका

वित्त मंत्री के तौर पर जेटली के कार्यकाल में मोदी सरकार के कई बड़े आर्थिक फैसले हुए।

GST लागू करना उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक और आर्थिक जिम्मेदारियों में शामिल रहा। अलग-अलग राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका अहम थी। तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने भी जेटली को GST व्यवस्था के लिए राजनीतिक सहमति बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला नेता बताया था।

इसी दौर में नोटबंदी का बड़ा फैसला भी हुआ। अमित शाह ने जेटली के निधन के बाद उनके योगदान को याद करते हुए GST, नोटबंदी और काले धन के खिलाफ कार्रवाई जैसे फैसलों का विशेष उल्लेख किया था।

संसद में उनकी आवाज का अलग असर था

अरुण जेटली की सबसे बड़ी ताकत उनकी भाषण शैली थी। जटिल कानूनी, आर्थिक और संवैधानिक मुद्दों को सरल भाषा में रखना उनकी खासियत मानी जाती थी।

वह 2009 से 2014 तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे। इस दौरान संसद में उनकी बहसों और सरकार पर हमलों ने उन्हें बीजेपी के प्रमुख संसदीय चेहरों में स्थापित किया।

उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक होने के साथ-साथ तर्कपूर्ण भी मानी जाती थी। यही कारण था कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में अपने राजनीतिक संपर्कों के लिए जाने जाते थे।

स्वास्थ्य ने धीरे-धीरे राजनीति से दूर किया

जेटली का स्वास्थ्य उनके राजनीतिक जीवन के अंतिम वर्षों में बड़ी चुनौती बन गया था। 2005 में उनकी ट्रिपल बाईपास सर्जरी हुई थी। 2018 में उनका गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ।

लगातार बिगड़ती सेहत के कारण 2019 का लोकसभा चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीतिक जिम्मेदारियों से दूर रखने का फैसला किया।

अगस्त 2019 में सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। 24 अगस्त को दोपहर 12:07 बजे एम्स ने उनके निधन की पुष्टि की।

पुण्यतिथि पर फिर याद आता है मोदी का वो संदेश

अरुण जेटली के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सिर्फ एक वरिष्ठ बीजेपी नेता या पूर्व मंत्री के रूप में याद नहीं किया था। उन्होंने उन्हें अपना करीबी मित्र बताते हुए कहा था कि उनके पास संविधान, इतिहास, सार्वजनिक नीति, शासन और प्रशासन की गहरी समझ थी।

मोदी ने यह भी कहा था कि जेटली ने लंबे राजनीतिक जीवन में सरकार और पार्टी के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और देश के आर्थिक विकास तथा रक्षा क्षमता मजबूत करने में योगदान दिया।

अमित शाह ने भी जेटली को अपना वरिष्ठ सहयोगी और मार्गदर्शक बताते हुए उनके निधन को व्यक्तिगत क्षति कहा था। शाह के मुताबिक, जेटली का पार्टी और सरकार में योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।

अमित शाह से पहले मोदी के सबसे खास चेहरों में थे जेटली

आज नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी की राजनीति में अमित शाह की जोड़ी सबसे ज्यादा चर्चा में रहती है। लेकिन एक समय ऐसा था जब मोदी के सबसे भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगियों में अरुण जेटली का नाम सबसे आगे था।

जेटली के पास चुनावी राजनीति का बड़ा जनाधार नहीं था और वह हमेशा राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता, कानूनी समझ, संगठन के भीतर पकड़ और संसद में प्रभाव ने उन्हें बीजेपी के शीर्ष नेताओं में बनाए रखा।

उनकी खासियत यह थी कि वह राजनीति को केवल चुनावी आंकड़ों के जरिए नहीं देखते थे। कानून, अर्थव्यवस्था, संसद, मीडिया और राजनीतिक रणनीति—इन सभी क्षेत्रों की समझ ने उन्हें मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाया।

आज उनकी पुण्यतिथि पर Arun Jaitley को याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका राजनीतिक सफर यह दिखाता है कि बिना किसी बड़े चुनावी जनाधार के भी कोई नेता अपनी बौद्धिक क्षमता, संगठनात्मक समझ और राजनीतिक विश्वसनीयता के दम पर राष्ट्रीय राजनीति में कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है।

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