The Red Ink: क्या डायनासोर से बना लेदर बैग संभव है? नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने ऐसा ही एक चौंकाने वाला दावा किया है। उनका कहना है कि उन्होंने T-Rex के अवशेषों से मिले कोलेजन की मदद से लैब में लेदर तैयार कर एक हैंडबैग बनाया है, जिसकी कीमत करोड़ों में आंकी जा रही है।
कैसे बना ‘डायनासोर लेदर’ बैग?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह बैग अमेरिका में मिले टायरानोसॉरस रेक्स (T. rex) के अवशेषों से प्राप्त कोलेजन (प्रोटीन) के आधार पर तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया में प्राचीन प्रोटीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक अज्ञात जीव की कोशिकाओं में डाला गया, जिससे नया कोलेजन विकसित किया गया। बाद में इसी कोलेजन को प्रोसेस कर लेदर का रूप दिया गया।
एम्स्टर्डम में प्रदर्शित, करोड़ों में कीमत
टील (नीला-हरा) रंग का यह अनोखा हैंडबैग फिलहाल Art Zoo Museum में रखा गया है। इसे 11 मई 2026 तक आम लोगों के लिए रखा जाएगा, जिसके बाद इसकी नीलामी की जाएगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बैग की कीमत 4 करोड़ 50 लाख रुपये से भी ज्यादा हो सकती है।

तीन कंपनियों ने मिलकर किया निर्माण
इस प्रोजेक्ट पर तीन कंपनियों The Organoid, VML और Lab-Grown Leather Ltd ने मिलकर काम किया। The Organoid के CEO थॉमस मिशेल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस बैग को बनाने में कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। Lab-Grown Leather Ltd की CEO चे कोनन का कहना है कि यह लेदर पारंपरिक लेदर के मुकाबले पर्यावरण के लिए ज्यादा अनुकूल हो सकता है।
वैज्ञानिकों में मतभेद, दावे पर उठे सवाल
हालांकि, इस दावे को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में बहस छिड़ गई है। व्रिजे यूनिवर्सिटी एम्स्टर्डम की वैज्ञानिक मेलानी ड्यूरिंग का कहना है कि डायनासोर की हड्डियों में कोलेजन केवल टूटे-फूटे रूप में ही बचता है, जिससे असली लेदर या स्किन बनाना संभव नहीं है। वहीं मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक थॉमस आर. होल्ट्ज जूनियर ने भी कहा कि जो कोलेजन मिलता है, वह हड्डियों के अंदर से होता है, त्वचा से नहीं इसलिए उसमें लेदर जैसी संरचना नहीं बन सकती।
आलोचना पर क्या बोले निर्माता?
इन सवालों के जवाब में The Organoid के CEO थॉमस मिशेल ने कहा कि जब भी कुछ नया किया जाता है, तो आलोचना स्वाभाविक है। उन्होंने इसे सकारात्मक बताते हुए कहा कि वे इस प्रतिक्रिया के लिए आभारी हैं। यह प्रोजेक्ट विज्ञान और कल्पना के बीच की एक दिलचस्प कड़ी बन गया है। एक तरफ इसे भविष्य की टेक्नोलॉजी बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसकी वैज्ञानिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।




