जंगल से ट्रेन तक: ‘सफर’ पर निकले किंग कोबरा! वैज्ञानिकों की चेतावनी- ये इत्तेफाक नहीं, खतरे का संकेत है

The Red Ink: किंग कोबरा जिसे जंगलों का ‘नागराज’ कहा जाता है अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है। एक चौंकाने वाले अध्ययन में सामने आया है कि ये खतरनाक सांप अब ट्रेनों में “सफर” कर रहे हैं। यह कोई कहानी नहीं बल्कि वैज्ञानिकों की रिसर्च पर आधारित एक गंभीर चेतावनी है जो बताती है कि इंसानी ढांचे अब जंगल और जंगली जीवों के बीच की सीमाएं तोड़ रहे हैं।

प्राकृतिक आवास से बाहर क्यों आ रहे किंग कोबरा?
भारत के पश्चिमी घाट के घने जंगल किंग कोबरा का प्राकृतिक घर हैं, जहां उन्हें शिकार, पानी और सुरक्षित आश्रय मिलता है लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, अब ये सांप जंगलों से निकलकर रेलवे ट्रैक और ट्रेनों तक पहुंच रहे हैं जो उनके संरक्षण के लिए चिंता का विषय है।

वैज्ञानिकों का दावा ‘ट्रेनों में सफर कर रहे हैं किंग कोबरा’
सूरत के सरीसृप विशेषज्ञ दिकांश परमार के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका बायोट्रोपिका में प्रकाशित हुआ है, जिसमें बताया गया है कि किंग कोबरा अनजाने में ट्रेनों के जरिए लंबी दूरी तय कर सकते हैं यह दुनिया का सबसे लंबा विषैला सांप है, जिसे ओफियोफैगस कालिंगा कहा जाता है।
इस पत्रिका में शोध प्रकाशित होना खुद में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि इसकी सफलता दर केवल 36% है।

रेलवे स्टेशन के आसपास मिले किंग कोबरा
अध्ययन में गोवा के 47 स्थानों का विश्लेषण किया गया, जिनमें 18 स्थान उत्तर गोवा में, 29 स्थान दक्षिण गोवा में थे। इनमें से सभी स्थान या तो रेलवे ट्रैक के पास थे या रेलवे स्टेशन के आसपास। 2002 से 2024 के बीच गोवा के पशु बचाव दल ने 120 किंग कोबरा बचाए, जिनमें से 47 रेलवे क्षेत्रों के आसपास पाए गए।

जहां नहीं होना चाहिए था, वहां मिले ‘नागराज’
कई किंग कोबरा ऐसे स्थानों पर पाए गए जो उनके प्राकृतिक आवास नहीं थे, जैसे- चंदोर रेलवे स्टेशन, वास्को-डि-गामा के पास, लोलिम, पालोलेम और पेडणे स्टेशन के आसपास, एक किंग कोबरा तो रेलवे स्टेशन से सिर्फ 200 मीटर की दूरी पर मिला।

कैसे पहुंच रहे हैं ट्रेन तक? वैज्ञानिकों की थ्योरी
दिकांश परमार और उनकी टीम ने एक नई थ्योरी दी है “रेलवे डिस्पर्सल हाइपोथिसिस” इसके मुताबिक किंग कोबरा शिकार (चूहों) की तलाश में रेलवे यार्ड में पहुंचते हैं वहां वे मालगाड़ियों या यात्री ट्रेनों में चढ़ जाते हैं और अनजाने में सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंच जाते हैं। कर्नाटक के जंगलों (कैसल रॉक, दांडेली) से गोवा जाने वाली ट्रेनें इस “सफर” का मुख्य जरिया मानी जा रही हैं।

भोजन भी बन रहा वजह
रेलवे ट्रैक के आसपास अनाज और खाने के पैकेट गिरते रहते हैं इससे चूहों की संख्या बढ़ती है और चूहे ही किंग कोबरा का मुख्य भोजन हैं। यही वजह है कि सांप इन इलाकों की ओर आकर्षित होते हैं।

बारिश और बाढ़ में ट्रेन बनती है ‘शरण’
वैज्ञानिकों के अनुसार, बारिश या बाढ़ के समय किंग कोबरा सुरक्षित जगह की तलाश में ट्रेनों में घुस सकते हैं। यानी यह सफर कभी जानबूझकर नहीं बल्कि परिस्थितियों का परिणाम भी हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने भी जताई चिंता
इस अध्ययन में अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिक भी शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है रेलवे और सड़कें सिर्फ बाधा नहीं बल्कि “तेज गलियारे” भी बन सकती हैं जो अनजाने में वन्यजीवों के मूवमेंट को प्रभावित कर रही हैं।

मानव और सांप- दोनों के लिए खतरा
यह स्थिति दोहरी चुनौती पैदा कर रही है किंग कोबरा मानव बस्तियों में पहुंचकर खतरा बन सकते हैं वहीं खुद भी भूख, तनाव और मौत के जोखिम में पड़ जाते हैं।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक? समाधान क्या है
शोधकर्ताओं ने कुछ अहम सुझाव दिए हैं जंगलों में ट्रेनों को अनावश्यक रूप से न रोका जाए, ट्रेनों में बचा हुआ खाना न छोड़ा जाए, वनों के विनाश को रोका जाए ताकि सांपों को अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े।

यह कहानी सिर्फ एक सांप के “सफर” की नहीं है यह उस बदलते संतुलन की कहानी है, जहां इंसान और प्रकृति की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। किंग कोबरा का ट्रेन में पहुंचना एक हादसा हो सकता है लेकिन बार-बार होना एक चेतावनी है। अब सवाल यह नहीं कि सांप ट्रेन में कैसे पहुंचे..? सवाल यह है कि जंगल आखिर उनके लिए बचा कितना है..?

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