नक्सलबाड़ी से बस्तर तक: 180 जिलों से सिमटकर 7 पर आया नक्सलवाद, अमित शाह के बयान से पहले पूरी हकीकत

The Red Ink: लोकसभा में आज देश के गृह मंत्री अमित शाह नक्सलवाद पर बयान देने वाले हैं लेकिन इस बहस के बीच सबसे अहम सवाल यही है क्या भारत में नक्सलवाद सच में खत्म होने की कगार पर है या यह सिर्फ सिमटकर नए रूप में मौजूद है? इस सवाल का जवाब समझने के लिए नक्सलवाद के इतिहास, विस्तार, सरकारी रणनीति और मौजूदा आंकड़ों को एक साथ देखना जरूरी है।

शुरुआत: 1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह
भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में नक्सलबाड़ी (पश्चिम बंगाल) से हुई। यह कोई आतंकी आंदोलन नहीं था बल्कि जमीन के अधिकार, किसानों और आदिवासियों के शोषण, सामाजिक असमानता के खिलाफ एक उग्र विरोध के रूप में उभरा लेकिन समय के साथ यह आंदोलन माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर सशस्त्र संघर्ष में बदल गया और यहीं से “नक्सलवाद” देश की आंतरिक सुरक्षा चुनौती बन गया।

रेड कॉरिडोर: जब 180 जिलों तक फैला नेटवर्क
2000 के दशक तक नक्सलवाद का विस्तार इतना बढ़ गया कि यह करीब 180 जिलों तक फैल गया। इसे “रेड कॉरिडोर” कहा गया, जिसमें शामिल थे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल। यह वह दौर था जब सरकार ने इसे देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना।

गिरावट का दौर: डेटा क्या कहता है?
पिछले एक दशक में नक्सलवाद में तेज गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2014 तक देश भर में 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थें जो हाल के वर्ष में लगभग 38 बचे वहीं अगर वर्तमान स्थिति की बात की जाए तो 6-7 जिले सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।

आज नक्सल प्रभाव मुख्य रूप से सीमित है:
छत्तीसगढ़: बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कांकेर
झारखंड: पश्चिम सिंहभूम
ओडिशा: कंधमाल

सरकार का मॉडल: बंदूक + विकास
सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई है पहली सुरक्षा कार्रवाई- CoBRA जैसे विशेष बल, 300+ नए सुरक्षा कैंप, ऑपरेशन आधारित एरिया डोमिनेशन और दूसरी विकास पर फोकस- 12,000 किमी से ज्यादा सड़क निर्माण, मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी, दूरदराज इलाकों में प्रशासन की पहुंच शामिल है। इसके अलावा सरकार द्वारा संस्थागत ढांचा LWE (Left Wing Extremism) डिवीजन बनाया गया है जो राज्यों के साथ कोऑर्डिनेशन करने का काम करता है।

असर: हिंसा और मौतों में गिरावट
डेटा साफ संकेत देता है नक्सली हिंसा में 50% से ज्यादा कमी, सुरक्षा बलों के हताहतों में 70% तक गिरावट, सरेंडर करने वाले नक्सलियों की संख्या में वृद्धि हुई है. बस्तर जैसे इलाकों में 90% से ज्यादा क्षेत्र नक्सल मुक्त होने के दावे भी सामने आए हैं।

लेकिन क्या समस्या खत्म हो गई है?
यहीं सबसे बड़ा सवाल है विशेषज्ञों के अनुसार नक्सलवाद की जड़ें अब भी मौजूद हैं आदिवासी इलाकों में गरीबी, विकास की कमी, प्रशासन पर भरोसे का संकट, शिक्षा और रोजगार की कमी यानी बंदूकें कम हुई हैं लेकिन कारण पूरी तरह खत्म नहीं हुए।

बदलता स्वरूप: कमजोर लेकिन खत्म नहीं
नक्सलवाद अब सीमित भौगोलिक क्षेत्र में सिमटा है, बड़े हमलों की क्षमता घटी है लेकिन स्थानीय नेटवर्क अब भी मौजूद है यानी यह “कमजोर” जरूर हुआ है लेकिन “खत्म” नहीं।

आंकड़े बनाम जमीनी सच्चाई
1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन आज 180 जिलों से सिमटकर कुछ जिलों तक आ गया है यह सरकार की रणनीति की बड़ी सफलता मानी जा सकती है लेकिन जमीनी सच्चाई यह भी है कि समस्या की जड़ें सामाजिक और आर्थिक हैं। और जब तक ये खत्म नहीं होंगी, खतरा पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता अब लोकसभा में अमित शाह के बयान से यह साफ होगा कि सरकार इस “सिमटती चुनौती” को पूरी तरह खत्म करने के लिए आगे क्या रोडमैप पेश करती है।

Hot this week

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वोटिंग से 48 घंटे पहले नाम जुड़ा तो भी डाल सकेंगे वोट

The Red Ink पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता...

Topics

Related Articles

Popular Categories