The Red Ink
भगवान श्रीकृष्ण को लेकर मौलाना जर्जिस अंसारी के विवादित बयान के बाद अब समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन का बयान भी चर्चा में आ गया है। मुरादाबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण, इस्लामी परंपरा में बताए गए पैगंबरों में शामिल हो सकते हैं। उनके इस बयान के बाद धार्मिक और राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।
एसटी हसन ने क्या कहा?
पूर्व सांसद एसटी हसन ने कहा कि इस्लामी मान्यता के अनुसार दुनिया में करीब 1 लाख 24 हजार पैगंबर आए हैं। उनका कहना था कि कुछ मुस्लिम स्कॉलर्स का मानना है कि संभव है श्रीराम और श्रीकृष्ण भी उन्हीं पैगंबरों में से रहे हों। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि इतने लंबे समय में ऐतिहासिक और धार्मिक तथ्यों में बदलाव आ जाते हैं, इसलिए वह इस विषय पर कोई अंतिम दावा नहीं कर सकते। उन्होंने दोनों को मानवता को मार्गदर्शन देने वाली महान हस्तियां बताया।
मौलाना जर्जिस अंसारी के बयान के बाद बढ़ा विवाद
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब इटावा के मौलाना जर्जिस अंसारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में उन्होंने दावा किया था कि भगवान श्रीकृष्ण मुस्लिम थे और पांच वक्त की नमाज अदा करते थे। इस बयान पर कई हिंदू संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। लखनऊ में हिंदू महासभा की ओर से हजरतगंज थाने में शिकायत भी दर्ज कराई गई।
गीता के श्लोक की व्याख्या पर भी उठे सवाल
मौलाना जर्जिस अंसारी ने अपने दावे के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 के श्लोक 10 का हवाला दिया था। हालांकि, संस्कृत और गीता के जानकारों का कहना है कि इस श्लोक में योग साधना, आत्मसंयम और एकांत में ध्यान की बात कही गई है। इसमें नमाज, इस्लाम या किसी विशेष धार्मिक पद्धति का कोई उल्लेख नहीं मिलता। विशेषज्ञों के अनुसार श्लोक की मूल भावना आध्यात्मिक साधना और मन के नियंत्रण से जुड़ी है।
जौहर यूनिवर्सिटी पर भी बोले एसटी हसन
मीडिया से बातचीत के दौरान एसटी हसन ने जौहर यूनिवर्सिटी पर जारी ध्वस्तीकरण कार्रवाई को लेकर भी सरकार से पुनर्विचार की अपील की। उन्होंने कहा कि यह एक शैक्षणिक संस्थान है, जहां सभी समुदायों के छात्र पढ़ते हैं। ऐसे संस्थानों को बचाने के लिए सरकार को कोई व्यावहारिक समाधान तलाशना चाहिए।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर जताई शंका
एसटी हसन ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी राज्य की सरकार कार्यकाल पूरा होने से पहले गिर जाती है, तो ऐसी स्थिति में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था व्यवहारिक रूप से कठिन हो सकती है। उनके अनुसार, पंचायत से लेकर लोकसभा तक सभी चुनाव एक साथ कराना कई प्रशासनिक और संवैधानिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।




