“देश चलाना अब मोदी के बस में नहीं”: Rahul Gandhi का हमला, ‘7 अपीलों’ को बताया नाकामी का संकेत

The Red Ink
प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया अपीलों को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जनता से त्याग की अपील करना दरअसल सरकार की विफलता को दर्शाता है। उनके मुताबिक, अब हालात ऐसे हो गए हैं कि लोगों को यह बताया जा रहा है कि क्या खरीदें और क्या नहीं।

राहुल गांधी का सीधा हमला
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि “सोना न खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम इस्तेमाल करो, तेल और खाद बचाओ, मेट्रो से चलो और घर से काम करो”—ये सलाह नहीं, बल्कि सरकार की नाकामी के संकेत हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पिछले कई वर्षों में देश को ऐसी स्थिति में ला दिया गया है, जहां आम जनता पर जिम्मेदारी डाली जा रही है।

पीएम मोदी ने क्यों की थीं अपीलें
दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने तेलंगाना के सिकंदराबाद में एक जनसभा के दौरान लोगों से अपील की थी कि देश की विदेशी मुद्रा बचाने और वैश्विक संकट से निपटने के लिए कुछ कदम उठाए जाएं। उन्होंने पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं को टालने, खाने के तेल का सीमित उपयोग करने और एक साल तक सोना न खरीदने जैसी बातें कही थीं।

वैश्विक संकट का दिया हवाला
पीएम मोदी ने कहा था कि भारत ऊर्जा के मामले में बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव, ईंधन और उर्वरकों की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में देश को मिलकर खर्च कम करने की दिशा में काम करना चाहिए।

विपक्ष का सरकार पर हमला
समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि चुनाव खत्म होते ही सरकार को संकट याद आ गया। वहीं, Sanjay Singh ने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव के दौरान जनता पर बोझ की बात नहीं करती, लेकिन बाद में लोगों से कटौती की अपील करने लगती है। कांग्रेस के Jairam Ramesh और तृणमूल कांग्रेस के Saket Gokhale ने भी आर्थिक स्थिति और नीति को लेकर सवाल उठाए।

किन खर्चों पर बढ़ रहा दबाव
आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुछ प्रमुख सेक्टर ऐसे हैं जहां विदेशी मुद्रा का भारी उपयोग हो रहा है— सोने के आयात पर हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं और निवेश के तौर पर इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। विदेश यात्राओं पर भारतीयों का खर्च तेजी से बढ़ा है। उर्वरकों का आयात भी महंगा होता जा रहा है, खासकर वैश्विक तनाव के कारण। कच्चे तेल पर देश की निर्भरता सबसे ज्यादा है, और कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

सियासत और अर्थव्यवस्था आमने-सामने
एक तरफ सरकार वैश्विक हालात का हवाला देकर बचत और संयम की अपील कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे आर्थिक प्रबंधन की कमजोरी बता रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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