“वोट नहीं दिया तो सज़ा?” सुप्रीम कोर्ट का साफ जवाब- ‘लोकतंत्र में मजबूरी नहीं, भरोसा चलता है’

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क्या चुनाव में वोट नहीं देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है? क्या उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है? इन सवालों पर देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए ऐसी किसी भी मांग पर सुनवाई से इनकार कर दिया है।
Supreme Court of India ने कहा कि मतदान अनिवार्य बनाना या इसके लिए दंड तय करना नीतिगत मामला है और यह फैसला सरकार तथा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने साफ कहा कि लोकतंत्र में किसी नागरिक को वोट देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

याचिका पर कोर्ट का रुख
यह याचिका अजय गोयल द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि जो लोग मतदान नहीं करते, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए या उन पर कुछ पाबंदियां लगाई जाएं। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि यह न्यायपालिका का नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं का विषय है। हालांकि, याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण के पास जाने की छूट दी गई।

CJI Surya Kant की टिप्पणी- ‘क्या हम लोगों को गिरफ्तार करें?’
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कई अहम और व्यावहारिक सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर वोट न देने वालों पर कार्रवाई की मांग को मान लिया जाए, तो क्या अदालत ऐसे लोगों की गिरफ्तारी का आदेश देगी? उन्होंने कहा कि भारत एक कानून के शासन वाला लोकतांत्रिक देश है, जहां पिछले 75 वर्षों से लोगों के विवेक और विश्वास पर भरोसा किया जाता रहा है। CJI ने यह भी कहा कि सभी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे मतदान करें लेकिन यदि कोई व्यक्ति वोट नहीं देता, तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता।

‘रोज़ी-रोटी या वोट?’- कोर्ट का मानवीय पहलू
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक अहम उदाहरण भी दिया। CJI ने कहा कि अगर कोई गरीब व्यक्ति यह कहे कि उसे अपने परिवार के लिए रोज़ी-रोटी कमानी है और वह वोट डालने नहीं जा सकता, तो ऐसे में अदालत उसे क्या जवाब देगी? इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार व्यक्तिगत परिस्थितियों से भी जुड़ा होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरकारी सुविधाएं छीनने के सुझाव पर हल्का जवाब
याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया कि जो लोग वोट नहीं देते, उन्हें सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इस पर CJI ने हल्के अंदाज़ में कहा- “आप यह काम हमारी तरफ से कर लीजिए।” अदालत ने साफ किया कि इस तरह के दंडात्मक प्रावधान लागू करना न्यायपालिका का काम नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि भारत में मतदान एक अधिकार है, बाध्यता नहीं। नागरिकों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, लेकिन उन्हें इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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