पश्चिम बंगाल में बीजेपी की प्रचंड जीत में SIR फैक्टर? आंकड़ों से समझिए पूरा समीकरण

The Red Ink
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। 294 सीटों वाली विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 206 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 80 सीटों पर सिमट गई। इन नतीजों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर हो रही है, जिसके तहत करीब 91 लाख नाम सूची से हटाए गए थे।

क्या था SIR और क्यों बना मुद्दा?
चुनाव से पहले हुए इस विशेष अभियान में मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट और अन्य तकनीकी कारणों से मतदाताओं के नाम हटाए गए। हालांकि, विपक्ष खासकर टीएमसी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया का असर विशेष समुदायों पर ज्यादा पड़ा, जिससे चुनावी संतुलन प्रभावित हुआ।

आंकड़ों में दिखता असर
डेटा के मुताबिक, राज्य की 112 सीटें ऐसी थीं जहां 25 हजार से ज्यादा मतदाता सूची से हटाए गए। 2021 में इन सीटों में से 86 पर टीएमसी जीती थी लेकिन 2026 में इन्हीं सीटों में से 72 सीटें बीजेपी के खाते में चली गईं टीएमसी को सिर्फ 39 सीटों पर जीत मिली। इन सीटों में भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट भी शामिल रही, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा।

वोट शेयर और SIR का कनेक्शन
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 27 लाख ऐसे मतदाता हटाए गए जिन्हें ‘तार्किक विसंगतियों’ की श्रेणी में रखा गया। यह कुल वोटर्स का लगभग 5% था। विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और टीएमसी के वोट शेयर में भी लगभग इतना ही अंतर देखने को मिला, जिससे SIR की भूमिका पर सवाल और गहरे हो गए।

क्या सिर्फ SIR ही जिम्मेदार था?
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी नतीजों को केवल SIR से जोड़ना सही नहीं होगा। राज्य में सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency), रोजगार और स्थानीय मुद्दों पर नाराजगी, जमीनी स्तर पर संगठन की मजबूती, केंद्रीय बलों की तैनाती से मतदाताओं का बढ़ा भरोसा ये सभी फैक्टर भी नतीजों को प्रभावित करने वाले माने जा रहे हैं।

मुस्लिम वोट और बदलता समीकरण
इस चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक में भी बिखराव देखने को मिला, जो पहले टीएमसी का मजबूत आधार माना जाता था। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा, जिससे संकेत मिलता है कि वोट ट्रांसफर पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा। पश्चिम बंगाल के नतीजे सिर्फ एक फैक्टर का परिणाम नहीं हैं। SIR ने चुनावी गणित को जरूर प्रभावित किया, लेकिन इसके साथ-साथ राजनीतिक माहौल, जनभावनाएं और रणनीति भी उतनी ही अहम रहीं। यह चुनाव साफ संकेत देता है कि बदलते राजनीतिक समीकरण में हर छोटा बदलाव बड़ा असर डाल सकता है।

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