KGMU दवा घोटाले पर बड़ी कार्रवाई: यूरोलॉजी विभाग के HOD हटाए गए, 4 आरोपियों पर FIR की तैयारी

The Red Ink
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में सामने आए करोड़ों रुपये के दवा घोटाले ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। शुरुआती जांच में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए यूरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष (HOD) डॉ. अपुल गोयल को पद से हटा दिया है। इसके अलावा तीन आउटसोर्स कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया है, जबकि एक नियमित फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया है।

गरीब मरीजों के नाम पर खरीदी जा रही थीं महंगी दवाएं
जांच में सामने आया कि असाध्य रोग योजना के तहत गरीब मरीजों के इलाज के लिए खरीदी जाने वाली दवाओं के बजट में अचानक कई गुना बढ़ोतरी हुई थी। जहां पहले हर महीने लगभग 10 लाख रुपये की दवाएं खरीदी जाती थीं, वहीं हाल के महीनों में यह खर्च बढ़कर 40 से 45 लाख रुपये तक पहुंच गया। महंगी कैंसर, प्रोटीन और आयरन दवाओं की असामान्य खपत ने प्रशासन का ध्यान खींचा। दस्तावेजों की जांच में कई ऐसे मरीजों के नाम सामने आए जिन्हें बार-बार भर्ती दिखाकर उनके नाम पर दवाओं की खरीद की गई थी।

जांच रिपोर्ट के बाद एक्शन मोड में प्रशासन
मामले की गंभीरता को देखते हुए कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए डॉ. अपुल गोयल को विभागाध्यक्ष पद से हटा दिया। उन पर योजना की निगरानी और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में लापरवाही के आरोप लगे हैं। जांच पूरी होने तक उन्हें पद से अलग रखा गया है ताकि आगे की कार्रवाई निष्पक्ष तरीके से हो सके। फिलहाल जनरल सर्जरी विभाग के डॉ. एच.एस. पहवा को यूरोलॉजी विभाग का कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

तीन कर्मचारियों की नौकरी गई, चार पर दर्ज होगा मुकदमा
विश्वविद्यालय प्रशासन ने यूरोलॉजी विभाग में तैनात तीन आउटसोर्स कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। इन कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई है। साथ ही स्थानीय खरीद केंद्र (लोकल परचेज काउंटर) पर तैनात फार्मासिस्ट अरशद वासी को निलंबित कर उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

घोटाले की रकम की होगी रिकवरी
KGMU प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि घोटाले में हुई वित्तीय क्षति की भरपाई के लिए संबंधित सेवा प्रदाता एजेंसी से रकम की वसूली की जाएगी। विश्वविद्यालय का कहना है कि दोषियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी दोनों स्तरों पर कार्रवाई जारी रहेगी।

मरीजों के नाम पर फर्जीवाड़े की आशंका
प्रारंभिक जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि कुछ मरीजों के दस्तावेजों का इस्तेमाल बार-बार कर दवाओं की खरीद दिखाई गई। इस पूरे नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि फर्जी खरीद प्रक्रिया में और कौन-कौन शामिल था।

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