25 शब्द भी नहीं टाइप कर पाए ‘बाबू’, कुर्सी गई… DM ने बना दिया चपरासी

The Red Ink: सरकारी नौकरी को अक्सर ‘सेफ जोन’ माना जाता है लेकिन कानपुर में ये धारणा तीन बाबुओं पर भारी पड़ गई। यहां 25 शब्द प्रति मिनट की मामूली टाइपिंग स्पीड भी पूरी न कर पाने वाले तीन जूनियर क्लर्कों को जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने सीधे चतुर्थ श्रेणी में भेज दिया।

कौन थे ये बाबू?
एडीएम सिटी राजेश कुमार के मुताबिक, प्रेमनाथ यादव, अमित कुमार यादव और नेहा श्रीवास्तव को साल 2023 में मृतक आश्रित कोटे के तहत कलेक्ट्रेट में जूनियर क्लर्क बनाया गया था। नियम साफ थे—एक साल के भीतर टाइपिंग टेस्ट पास करो, जिसमें कम से कम 25 शब्द प्रति मिनट की स्पीड जरूरी है।

मौका मिला… फिर मौका मिला… लेकिन नतीजा वही
2024 में पहला टेस्ट हुआ तीनों फेल। प्रशासन ने उस वक्त सख्ती नहीं दिखाई, सिर्फ वेतन वृद्धि रोककर दूसरा मौका दे दिया लेकिन 2025 में भी कहानी नहीं बदली टाइपिंग स्पीड वहीं की वहीं। यानी दो साल में भी 25 शब्द प्रति मिनट की रफ्तार हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद प्रशासन का सब्र जवाब दे गया।

DM का साफ कटाक्ष- काम नहीं आता तो कुर्सी क्यों?
जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने बिना लाग-लपेट साफ कर दिया कि कलेक्ट्रेट जैसे अहम दफ्तर में टाइपिंग कोई ‘एक्स्ट्रा स्किल’ नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है। अगर कर्मचारी फाइल नोटिंग और दस्तावेज ही नहीं बना सकता, तो फिर उस कुर्सी पर बैठने का क्या मतलब?

सीधे क्लर्क से चपरासी- करियर पर ब्रेक
आदेश के बाद तीनों को क्लर्क पद से हटाकर चतुर्थ श्रेणी (चपरासी) में भेज दिया गया। इस एक फैसले ने न सिर्फ उनकी कुर्सी छीन ली, बल्कि आगे का करियर और वेतन ढांचा भी प्रभावित कर दिया।

दफ्तरों में खलबली, सिस्टम को मिला संदेश
इस कार्रवाई के बाद कलेक्ट्रेट ही नहीं, अन्य सरकारी विभागों में भी हलचल है। कई लोग इसे ‘जागने का अलार्म’ मान रहे हैं अब कुर्सी सिर्फ नौकरी से नहीं, काम से बचेगी। हालांकि कर्मचारी संगठनों में इस फैसले को लेकर मतभेद है। कुछ का कहना है कि ट्रेनिंग और समय देना चाहिए था, जबकि दूसरे इसे सिस्टम में जवाबदेही लाने वाला जरूरी कदम बता रहे हैं।

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