The Red Ink
आज देशभर में बकरीद यानी ईद-उल-अजहा का त्योहार पूरे उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ मनाया जा रहा है। मस्जिदों और ईदगाहों में लाखों लोगों ने नमाज अदा की, एक-दूसरे को मुबारकबाद दी और कुर्बानी की रस्म निभाई। यह इस्लाम धर्म के सबसे अहम त्योहारों में से एक माना जाता है। हालांकि भारत में लोग इसे आमतौर पर “बकरीद” कहते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस त्योहार का असली नाम क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और आखिर इसे बकरीद क्यों कहा जाने लगा।
क्या है बकरीद का असली नाम?
बकरीद का वास्तविक नाम “ईद-उल-अजहा” है। यह अरबी भाषा का शब्द है, जिसमें “ईद” का मतलब त्योहार और “अजहा” का अर्थ कुर्बानी या बलिदान होता है। इसी वजह से इसे “कुर्बानी का त्योहार” भी कहा जाता है। भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के कई देशों में बकरे की कुर्बानी अधिक होने के कारण आम बोलचाल में इसका नाम “बकरीद” पड़ गया। हालांकि इस त्योहार का संबंध सिर्फ बकरे से नहीं, बल्कि त्याग और आस्था से जुड़ा हुआ है।
क्या है बकरीद का इतिहास?
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार बकरीद की शुरुआत हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने को कहा। हजरत इब्राहिम के लिए उनके बेटे हजरत इस्माइल सबसे ज्यादा प्रिय थे। अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया। लेकिन जब वे कुर्बानी देने लगे, तब अल्लाह ने उनकी सच्ची नीयत और समर्पण देखकर हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बा भेज दिया। उसी घटना की याद में हर साल ईद-उल-अजहा मनाई जाती है और कुर्बानी की परंपरा निभाई जाती है।
कब शुरू हुई बकरीद की परंपरा?
इस्लामिक इतिहास के अनुसार यह परंपरा पैगंबर हजरत इब्राहिम के समय से चली आ रही है। माना जाता है कि इस घटना के बाद मुसलमानों के बीच अल्लाह के प्रति समर्पण और त्याग के प्रतीक के रूप में कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई। धीरे-धीरे यह त्योहार इस्लामी संस्कृति और धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा बन गया। आज दुनियाभर के मुस्लिम समुदाय इसे बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
बकरीद पर किन जानवरों की दी जाती है कुर्बानी?
इस्लामिक नियमों के मुताबिक सिर्फ बकरे की ही नहीं, बल्कि बकरी, भेड़, दुम्बा, बैल, भैंस और ऊंट जैसे जानवरों की भी कुर्बानी दी जा सकती है। हालांकि भारत में बकरे की कुर्बानी अधिक होने की वजह से “बकरीद” नाम ज्यादा लोकप्रिय हो गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुर्बानी के लिए जानवर का स्वस्थ, तय उम्र का और किसी गंभीर बीमारी से मुक्त होना जरूरी माना जाता है।
क्या सिर्फ जानवर की कुर्बानी है बकरीद?
बकरीद का असली संदेश सिर्फ जानवर की कुर्बानी तक सीमित नहीं है। यह त्योहार इंसान को त्याग, इंसानियत, भाईचारे और अल्लाह के प्रति समर्पण की सीख देता है। इस दिन लोग अपने अंदर के लालच, घमंड और बुराइयों को खत्म करने का संकल्प लेते हैं। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना भी इस त्योहार का बेहद अहम हिस्सा माना जाता है।
कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में क्यों बांटा जाता है?
इस्लामिक परंपरा के मुताबिक कुर्बानी के बाद गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। पहला हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों में बांटा जाता है और तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है। इसका उद्देश्य यह माना जाता है कि त्योहार की खुशी समाज के हर वर्ग तक पहुंचे और कोई भी व्यक्ति खुशियों से वंचित न रहे।
बकरीद पर किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
धार्मिक विद्वानों के मुताबिक कुर्बानी के दौरान साफ-सफाई और नियमों का पालन बेहद जरूरी है। जानवर को तकलीफ न दी जाए, बीमार या कमजोर जानवर की कुर्बानी न करें, खुलेआम लोगों को परेशान करने वाले तरीके से कुर्बानी न करें, प्रशासन और नगर निगम के दिशा-निर्देशों का पालन करें, सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक फोटो-वीडियो शेयर करने से बचें, कुर्बानी के बाद सफाई का विशेष ध्यान रखें, देशभर में दिखा बकरीद का उत्साह। दिल्ली, लखनऊ, मुंबई, हैदराबाद, भोपाल, पटना, कोलकाता और अन्य शहरों में आज सुबह से ही ईदगाहों और मस्जिदों में नमाज के लिए भारी भीड़ देखने को मिली। लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर बकरीद की मुबारकबाद दी और अमन-चैन की दुआ मांगी।
सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए कई राज्यों में प्रशासन अलर्ट मोड पर रहा और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया।




