ब्रेकअप ने खोला था पेपर लीक का राज, अब पड़ोसी के घर से मिला बैग बना बड़ा सुराग; Maharashtra Fake Marksheet Racket में 3 गिरफ्तार

Maharashtra Fake Marksheet Racket का अजीब खुलासा…

महाराष्ट्र में Maharashtra Fake Marksheet Racket का खुलासा जिस तरीके से हुआ, उसने पुलिस जांच को भी हैरान कर दिया। चंद्रपुर में एक पड़ोसी के घर महीनों से रखा कपड़े का बैग इस पूरे मामले की अहम कड़ी बन गया। बैग खोला गया तो उसके अंदर अलग-अलग विश्वविद्यालयों के नाम पर तैयार की गई संदिग्ध मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट मिले। दस्तावेज सामने आने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और अब तक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि महाराष्ट्र में इससे पहले एक अलग पेपर लीक विवाद का खुलासा कथित तौर पर एक प्रेम संबंध के टूटने के बाद सामने आई चैट से हुआ था। हालांकि दोनों मामले अलग-अलग हैं और इन्हें एक ही गिरोह या घटना का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

8 महीने से पड़ोसी के घर रखा था कपड़े का बैग

चंद्रपुर जिले के दुर्गापुर थाना क्षेत्र में सामने आए इस मामले की शुरुआत एक ऐसे बैग से हुई, जिसे आरोपी ने अपने पड़ोसी के घर रखवाया था।

पुलिस जांच के मुताबिक, तुकुम इलाके में रहने वाले परिमल बाबूराव गौरकर ने इसी साल जनवरी में अपने पड़ोसी वैभव मशिरकर के घर एक कपड़े का बैग सुरक्षित रखने के लिए दिया था। बताया गया कि गौरकर जरूरत के मुताबिक समय-समय पर बैग से कुछ कागजात निकालने के लिए वहां आता-जाता था।

लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी जब वह बैग लेने नहीं पहुंचा तो पड़ोसी को संदेह हुआ। बैग खोलने पर उसमें बड़ी संख्या में शैक्षणिक दस्तावेज दिखाई दिए।

मामला सामान्य नहीं लगा तो वैभव मशिरकर इन दस्तावेजों को लेकर दुर्गापुर पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस को पूरी जानकारी दी।

बैग में मिलीं नामी विश्वविद्यालयों के नाम वाली मार्कशीट

पुलिस के सामने जब बैग की जांच हुई तो उसमें कई विश्वविद्यालयों के नाम से तैयार किए गए दस्तावेज मिले। इनमें मार्कशीट, डिप्लोमा और माइग्रेशन सर्टिफिकेट शामिल बताए गए हैं।

जिन संस्थानों के नाम दस्तावेजों में सामने आए, उनमें संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय, सोलापुर विश्वविद्यालय, श्रीधर विश्वविद्यालय, पिलानी विश्वविद्यालय, गोंडवाना विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के नाम शामिल हैं।

पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन दस्तावेजों को किसके लिए बनाया गया था और क्या इनमें से किसी प्रमाणपत्र का वास्तविक इस्तेमाल नौकरी, पढ़ाई या किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया गया था।

5 से 10 लाख रुपये में फर्जी डिग्री देने का आरोप

पुलिस के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क पर आरोप है कि बिना परीक्षा दिए या निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए लोगों को शैक्षणिक डिग्री और प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने का काम किया जाता था।

इसके लिए कथित तौर पर 5 लाख से 10 लाख रुपये तक की रकम ली जाती थी। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि कितने लोगों ने इस नेटवर्क से संपर्क किया और अब तक कितने फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए।

इस मामले में परिमल बाबूराव गौरकर और वैभव भोलाराम सोनुले के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित मामला दर्ज किया गया था। सोनुले को शिकायत दर्ज होने के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया था।

बाद में पुलिस ने मुख्य आरोपी बताए जा रहे परिमल गौरकर और उसके कथित साथी अक्षय खोब्रागड़े को नागपुर से गिरफ्तार किया।

Maharashtra Fake Marksheet Racket में अब नेटवर्क की तलाश

तीन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस की जांच अब केवल बरामद दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस कथित रैकेट के पीछे कितने लोग जुड़े हुए हैं।

जांच में यह भी देखा जा रहा है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने के लिए जरूरी सामग्री, मुहर और हस्ताक्षर कहां से हासिल किए जाते थे।

पुलिस को बरामद दस्तावेजों पर इस्तेमाल की गई मुहरों और हस्ताक्षरों को लेकर भी संदेह है। दस्तावेजों की जांच के जरिए उनकी वास्तविकता और तैयार करने के तरीके का पता लगाया जा रहा है।

सरकारी नौकरी में इस्तेमाल हुए दस्तावेज?

जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस तरह के फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल सिर्फ व्यक्तिगत रिकॉर्ड के लिए नहीं, बल्कि नौकरी और शिक्षा से जुड़े कामों में भी किया जा सकता है।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इन प्रमाणपत्रों के आधार पर किसी व्यक्ति ने सरकारी या निजी नौकरी हासिल की, किसी शिक्षण संस्थान में दाखिला लिया या नौकरी में प्रमोशन का लाभ उठाया।

हालांकि, इन दस्तावेजों का वास्तविक इस्तेमाल कहां और किस उद्देश्य से हुआ, इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

बैंक खातों से खुलेगा पैसों का कनेक्शन?

पुलिस आरोपियों के वित्तीय लेनदेन की भी पड़ताल कर रही है। बैंक खातों और पुराने ट्रांजेक्शन की जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि फर्जी दस्तावेजों के बदले किस-किस से पैसे लिए गए।

अगर किसी एजेंट या बिचौलिए के जरिए ग्राहक तक दस्तावेज पहुंचाए जाते थे, तो वित्तीय रिकॉर्ड से उस नेटवर्क की कड़ियां सामने आ सकती हैं।

जांचकर्ता यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या चंद्रपुर में पकड़ा गया नेटवर्क महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों या दूसरे राज्यों में भी सक्रिय था।

पहले ब्रेकअप के बाद सामने आया था पेपर लीक मामला

महाराष्ट्र में शिक्षा और भर्ती से जुड़े फर्जीवाड़े की चर्चा के बीच एक अलग पेपर लीक मामला भी सुर्खियों में रहा है। इस मामले में महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग यानी MPSC की क्लास-II ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को लेकर सवाल उठे थे।

इस विवाद की शुरुआत एक व्हिसलब्लोअर के सामने आने के बाद हुई। ऋषिकेश बनगरडे पाटिल ने सोशल मीडिया पर परीक्षा की कट-ऑफ सूची को लेकर सवाल उठाए थे।

इसी दौरान गौरव पाटिल नाम के एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क किया। गौरव ने कथित तौर पर अपनी पूर्व प्रेमिका ऋतुजा पाटिल के साथ हुई व्हाट्सऐप बातचीत दिखाई थी।

यहीं से परीक्षा के सवाल कथित तौर पर पहले से लीक होने का दावा सामने आया। दावा किया गया कि 22 मार्च को हुई ड्रग्स इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के करीब 80 प्रतिशत प्रश्न परीक्षा से दो दिन पहले ही उपलब्ध थे।

प्रेमी ने बाद में अपने ही आरोपों से किया इनकार

मामला आगे बढ़ा तो गौरव पाटिल ने अपने शुरुआती दावों से पीछे हटते हुए MPSC को पत्र भेजा। उसने कहा कि जिन सवालों को कथित पेपर लीक से जोड़ा जा रहा था, वे वास्तव में एक प्रैक्टिस टेस्ट से जुड़े प्रश्न थे।

इसके बाद आयोग की ओर से भी मामले को लेकर एक प्रेस नोट जारी किया गया।

लेकिन व्हिसलब्लोअर ऋषिकेश बनगरडे पाटिल ने मामले को खत्म नहीं होने दिया। उनका कहना था कि उनके पास मूल व्हाट्सऐप चैट और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं।

उन्होंने बाद में एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार से संपर्क किया और कथित सबूत उनके सामने रखे। इसके बाद मामला मुंबई पुलिस तक पहुंचा और क्राइम ब्रांच ने जांच शुरू की।

पेपर लीक मामले में छह गिरफ्तारियां

जांच आगे बढ़ने के बाद MPSC से जुड़े अधिकारियों समेत छह लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई। इस मामले में जांच एजेंसियों ने कथित पेपर लीक से जुड़े आरोपों और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल की।

यह पूरा घटनाक्रम इस वजह से भी चर्चा में रहा क्योंकि मामले का एक अहम सुराग निजी रिश्ते और व्हाट्सऐप चैट से सामने आया था।

लेकिन Maharashtra Fake Marksheet Racket की कहानी इससे अलग है। फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्रों का यह मामला चंद्रपुर में पड़ोसी के घर रखे एक बैग से सामने आया।

फर्जी डिग्री नेटवर्क के पीछे कौन?

चंद्रपुर मामले में पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बरामद दस्तावेजों का इस्तेमाल किसने किया और इस कथित नेटवर्क का असली दायरा कितना बड़ा है।

पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ दस्तावेजों, बैंक खातों और संभावित संपर्कों की जांच कर रही है। अगर जांच में और लोगों की भूमिका सामने आती है तो मामले में आगे और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

फिलहाल कपड़े के एक बैग से शुरू हुई जांच तीन गिरफ्तारियों तक पहुंच चुकी है। वहीं पुलिस यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि नामी विश्वविद्यालयों के नाम वाले ये संदिग्ध दस्तावेज सिर्फ तैयार करके रखे गए थे या इनके जरिए पहले से कोई बड़ा फर्जीवाड़ा किया जा चुका है।

Maharashtra Fake Marksheet Racket की आगे की जांच में इन सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है।

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