IAS Durga Shakti Nagpal: उत्तर प्रदेश में नौकरशाही और न्यायपालिका के बीच टकराव से जुड़ा एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंच गया है। गोंडा में लंबित एक भूमि विवाद की सुनवाई कर रही सिविल जज से कथित तौर पर फोन पर बातचीत को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
आरोप है कि गोंडा की कमिश्नर और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी IAS Durga Shakti Nagpal ने 15 जुलाई को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान से फोन पर बातचीत की थी। जज के अनुसार, बातचीत में अदालत में लंबित भूमि विवाद का भी जिक्र हुआ। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस कथित हस्तक्षेप को न्यायिक प्रक्रिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए गंभीर माना है।
जज को फोन करने का मामला कैसे सामने आया?
विवाद तब गहराया जब गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने 15 जुलाई की एक फोन बातचीत का जिक्र किया। जज के मुताबिक, IAS Durga Shakti Nagpal ने उनसे टेलीफोन पर बात की थी।
जज ने बताया कि बातचीत के दौरान उनकी छुट्टी से संबंधित विषय के साथ अदालत में लंबित जमीन के मामले का भी उल्लेख हुआ। जज के अनुसार, बातचीत के लहजे और भाषा से उन्हें यह आभास हुआ कि पीठासीन अधिकारी के तौर पर उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
इसके बाद 4 अगस्त 2026 को जज शबीना खान ने जिला जज से इस मामले को अपनी अदालत से हटाने का अनुरोध किया। अनुरोध स्वीकार करते हुए मुकदमे को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया।
1997 से अदालत में लंबित है जमीन का विवाद
यह पूरा मामला गोंडा में नजूल भूमि के कुछ टुकड़ों से जुड़ा है, जो देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के नाम दर्ज बताए गए हैं। ज्योति विद्या मंदिर की ओर से नगर पालिका परिषद, गोंडा और राज्य सरकार के खिलाफ यह मुकदमा वर्ष 1997 से सिविल कोर्ट में लंबित है।
सरकार का पक्ष है कि संबंधित जमीन सरकारी कार्यों के लिए आरक्षित रखी गई थी और उस पर अवैध रूप से स्कूल का निर्माण किया गया।
मामले में साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया चल रही थी। इसी दौरान स्कूल प्रबंधन ने आरोप लगाया कि सरकारी अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल कर अदालत पर अनुचित दबाव बना रहे हैं। इसी आधार पर मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर ट्रांसफर करने की मांग की गई।
15 जुलाई की कॉल पर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गंभीर सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार खुद इस मुकदमे में एक पक्ष है, तो किसी अधिकारी की ओर से सीधे निचली अदालत के पीठासीन अधिकारी से संपर्क करना कितना उचित है।
अदालत ने यह भी गौर किया कि कमिश्नर की ओर से फोन किए जाने के तथ्य से इनकार नहीं किया गया है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया फोन के जरिए बनाया गया कथित दबाव न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट सख्त
IAS Durga Shakti Nagpal से जुड़े इस मामले में हाईकोर्ट ने अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
अदालत ने कहा कि अधीनस्थ अदालतों को किसी भी तरह के दबाव और अपमान से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पीठासीन अधिकारियों को बिना भय या बाहरी दबाव के अपनी न्यायिक जिम्मेदारियां निभाने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल मुकदमे को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर देने से कथित फोन कॉल का मुद्दा समाप्त नहीं हो जाता। यदि किसी अधिकारी की ओर से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रथम दृष्टया मामला सामने आता है, तो उस पर उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत विचार किया जा सकता है।
अब आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की तैयारी
हाईकोर्ट ने इस मामले को आपराधिक अवमानना की संभावित कार्यवाही के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि चीफ जस्टिस या किसी वरिष्ठ न्यायाधीश से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को आपराधिक अवमानना के तहत उपयुक्त अदालत के सामने रखा जाए।
यानी फिलहाल IAS Durga Shakti Nagpal के खिलाफ अंतिम रूप से दोष सिद्ध नहीं हुआ है। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया सामने आए तथ्यों को गंभीर मानते हुए आगे की कानूनी प्रक्रिया का रास्ता खोला है।
केस ट्रांसफर हुआ, लेकिन विवाद खत्म नहीं
मूल भूमि विवाद को जज शबीना खान की अदालत से दूसरी अदालत में ट्रांसफर किया जा चुका है। हालांकि, कथित फोन कॉल और न्यायिक प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव का मुद्दा अलग से गंभीरता से लिया जा रहा है।
अब इस मामले में आगे की कार्रवाई चीफ जस्टिस या संबंधित वरिष्ठ न्यायिक स्तर से मिलने वाले निर्देशों के आधार पर होगी। वहीं 1997 से लंबित मूल भूमि विवाद की सुनवाई दूसरी अदालत में आगे बढ़ेगी।
IAS Durga Shakti Nagpal मामले में आगे क्या?
IAS Durga Shakti Nagpal से जुड़े इस विवाद में फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि हाईकोर्ट ने कथित फोन संपर्क को महज सामान्य बातचीत मानकर नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने न्यायिक अधिकारियों को बाहरी दबाव से मुक्त रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
अब आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि इस मामले में आपराधिक अवमानना की औपचारिक कार्यवाही किस तरह आगे बढ़ती है। दूसरी ओर, मूल भूमि विवाद की सुनवाई भी अपने कानूनी रास्ते पर जारी रहेगी।




