Vande Mataram at Red Fort: लाल किले पर पहली बार राष्ट्रगान से पहले गूंजा ‘वंदे मातरम’, क्या बदल गया और क्यों छिड़ी बहस?

नई दिल्ली:
Vande Mataram at Red Fort इस बार 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह की सबसे बड़ी चर्चाओं में शामिल रहा। आज़ादी के बाद पहली बार दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर प्रधानमंत्री के आगमन के दौरान राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का पूर्ण संस्करण बजाया गया। केंद्र सरकार ने इसे ‘वंदे मातरम’ के 150वें वर्ष के सम्मान से जोड़ा है, जबकि विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने इस कदम पर सवाल भी उठाए हैं।

पहली बार बदली स्वतंत्रता दिवस समारोह की परंपरा

लाल किले पर आयोजित आधिकारिक समारोह में इस बार प्रोटोकॉल में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के साथ ही सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ बजाया गया। इसके बाद तिरंगा फहराया गया और फिर राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का गायन हुआ।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भी इस बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद पहली बार लाल किले से ‘वंदे मातरम’ का पूर्ण संस्करण बजाया गया है।

क्या है नया कानून?

हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में संशोधन किया है। संशोधित प्रावधानों के तहत अब राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को भी राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।

नए नियमों के अनुसार राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर भी वही दंड लागू हो सकता है, जो राष्ट्रगान के अपमान के मामलों में निर्धारित है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की सजा का प्रावधान है।

सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका को सम्मान देने के लिए उठाया गया है।

क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला?

‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे 1875 में लिखा था और बाद में इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का नारा बना। इसी वजह से सरकार का तर्क है कि इसे राष्ट्रीय जीवन में अधिक सम्मान मिलना चाहिए।

रक्षा मंत्रालय ने भी घोषणा की थी कि ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे विशेष स्थान दिया जाएगा।

विपक्ष और आलोचकों की आपत्तियां

इस फैसले को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस भी तेज हो गई है।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सवाल उठाते हुए कहा कि हर सरकारी कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर ‘वंदे मातरम’ का पूर्ण संस्करण गाने की अनिवार्यता व्यावहारिक चुनौतियां पैदा कर सकती है। उनका तर्क है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों को मिलाकर कार्यक्रमों की अवधि काफी बढ़ जाएगी।

थरूर ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सम्मान को कानून के जरिए लागू करने की बजाय लोगों के भीतर स्वाभाविक सम्मान विकसित किया जाना चाहिए।

मुस्लिम संगठनों ने क्यों जताया विरोध?

कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण संस्करण पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि गीत के बाद के पदों में भारत माता को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे इस्लामी मान्यताओं के अनुरूप नहीं माना जाता।

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ‘जन गण मन’ देश और उसके नागरिकों की बात करता है, जबकि ‘वंदे मातरम’ के कुछ हिस्सों में देवी-देवताओं के संदर्भ आते हैं। इसी वजह से वह इसके पूर्ण संस्करण को अनिवार्य बनाए जाने का विरोध कर रहे हैं।

टैगोर ने क्या सलाह दी थी?

इतिहास के पन्नों में भी इस मुद्दे पर चर्चा मिलती है। 1937 में कांग्रेस नेतृत्व ने जब ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार करने पर विचार किया था, तब रवींद्रनाथ टैगोर से राय ली गई थी।

टैगोर ने सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल पहले दो पदों को ही अपनाया जाए, क्योंकि उनमें मातृभूमि की सुंदरता और प्रकृति का वर्णन है। उन्होंने माना था कि बाद के पदों में देवी दुर्गा जैसे धार्मिक संदर्भ होने के कारण कुछ समुदायों को आपत्ति हो सकती है।

तमिलनाडु और केरल ने अलग रुख अपनाया

केंद्र के नए प्रावधानों के बाद कुछ राज्यों ने अपनी अलग स्थिति स्पष्ट कर दी है।

तमिलनाडु सरकार ने घोषणा की है कि राज्य के सभी सरकारी कार्यक्रमों में सबसे पहले राज्य गीत ‘तमिल थाई वाज़्थु’ ही गाया जाएगा।

वहीं केरल सरकार ने साफ किया है कि राज्य में पहले की तरह ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे और पूर्ण संस्करण को लागू नहीं किया जाएगा। राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में ‘वंदे मातरम’
लाल किले पर पहली बार ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान से पहले स्थान मिलने के बाद यह मुद्दा केवल एक सांस्कृतिक बदलाव नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय पहचान, परंपरा, संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक विविधता से जुड़ी बहस का विषय बन गया है।

सरकार इसे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को सम्मान देने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठन इसे वैचारिक एजेंडे से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है।

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