संसद में गूंजे Gen-Z के स्लैंग: ‘वास्तेगुना-हुइंया’ से ‘डेलुलू’ तक, युवाओं की भाषा में क्यों बोलने लगे नेता?

The Red Ink:

देश की राजनीति में इन दिनों सिर्फ मुद्दे नहीं, बल्कि भाषा भी बदलती दिखाई दे रही है। जंतर-मंतर से शुरू होकर कई शहरों तक फैले छात्र आंदोलन ने संसद की बहसों पर भी असर डाला है। लोकसभा में जहां आमतौर पर नीतियों, कानूनों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की भाषा सुनाई देती है, वहीं अब Gen-Z के चर्चित शब्दों ने भी जगह बना ली है।

मानसून सत्र के दौरान एंटी-पेपर लीक बिल पर चर्चा में कई सांसदों ने ‘MIA’, ‘FOMO’, ‘DELULU’, ‘VASTEGUNA HUIYA’, ‘KUCHU-PUCHU’ और ‘CLOCKED IT’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इनमें कुछ शब्द सोशल मीडिया से निकले हैं, कुछ मीम कल्चर का हिस्सा हैं और कुछ ऐसे हैं जिनका कोई तय अर्थ नहीं है। लेकिन संसद में इनका इस्तेमाल इस बात का संकेत माना जा रहा है कि राजनीतिक दल अब युवाओं की भाषा और उनके डिजिटल कल्चर को समझने या उससे जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

जंतर-मंतर के नारों से लोकसभा तक पहुंची नई भाषा

छात्र आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर कई ऐसे शब्द और नारे तेजी से वायरल हुए, जिन्हें Gen-Z अपनी बातचीत, रील्स, मीम्स और पोस्ट में इस्तेमाल करती है। आंदोलन के दौरान ‘वास्तेगुना-हुइंया’ और ‘कुचु-पुचु’ जैसे शब्द भी चर्चा में आए।

कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने लोकसभा में प्रदर्शनकारियों का जिक्र करते हुए इन शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने आंदोलन के दौरान युवाओं के अंदाज और उनके नारों को संसद में अपनी बात रखने का माध्यम बनाया।

‘वास्तेगुना-हुइंया’ का कोई तय शब्दार्थ नहीं है। यह एक वायरल वीडियो से चर्चा में आया और बाद में सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे मजाक, मीम और विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वहीं, ‘कुचु-पुचु’ आमतौर पर किसी को प्यार या दुलार से संबोधित करने के अंदाज में बोला जाता है।

विपक्ष पर निशाने के लिए ‘MIA’ और ‘FOMO’ का इस्तेमाल

शिवसेना के शिंदे गुट के सांसद श्रीकांत शिंदे ने विपक्ष पर हमला करते हुए Gen-Z की भाषा का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष के आंदोलन को युवाओं की भाषा में समझाया जा सकता है।

उन्होंने MIA शब्द का इस्तेमाल किया। MIA का पूरा अर्थ ‘Missing in Action’ है। यह मूल रूप से सैन्य शब्दावली से जुड़ा है और युद्ध के दौरान लापता सैनिक के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सोशल मीडिया की भाषा में इसका मतलब ऐसे व्यक्ति या समूह से लिया जाता है, जो लंबे समय तक नजर न आए या जिसकी कोई सक्रिय भूमिका दिखाई न दे।

श्रीकांत शिंदे ने विपक्ष को लेकर FOMO शब्द का भी इस्तेमाल किया। FOMO यानी ‘Fear of Missing Out’। इसका मतलब किसी ट्रेंड, घटना या गतिविधि से पीछे रह जाने का डर या उसमें शामिल न हो पाने की चिंता है।

‘डेलुलू’ और ‘क्लॉक्ड इट’ भी बने राजनीतिक बहस का हिस्सा

बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने पेपर लीक बिल पर विपक्ष की आलोचना करते हुए ‘DELULU’ शब्द का इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पर ‘डेलुलू’ शब्द ‘डिल्यूशनल’ से निकला माना जाता है। इसका इस्तेमाल किसी ऐसी कल्पना या सोच के लिए किया जाता है, जो वास्तविकता से काफी अलग हो।

हालांकि Gen-Z के बीच यह शब्द हमेशा नकारात्मक अर्थ में नहीं बोला जाता। सोशल मीडिया पर ‘Delulu is the Solulu’ जैसे वाक्य भी लोकप्रिय हैं। इसका आशय खुद को सकारात्मक कल्पना में रखने से है, ताकि व्यक्ति अपने लक्ष्य या सपनों को लेकर आशावादी बना रहे।

वहीं, बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने ‘CLOCKED IT’ शब्द का इस्तेमाल किया। Gen-Z की डिजिटल भाषा में इसका मतलब किसी छिपी हुई बात, पैटर्न या तथ्य को पहचान लेना और उसे सामने लाना होता है।

राजनीति में Gen-Z की एंट्री सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं

छात्र आंदोलन के बाद Gen-Z देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और उसके बाद युवाओं पर पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा। इसके बाद छात्र आंदोलन, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई।

आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया की भूमिका भी काफी अहम रही। युवाओं ने पारंपरिक राजनीतिक नारों के बजाय मीम, छोटे वीडियो, वायरल शब्दों और इंटरनेट की अपनी भाषा के जरिए अपनी बात आगे बढ़ाई।

यही वजह है कि संसद में भी नेताओं ने युवाओं के बीच लोकप्रिय शब्दों का इस्तेमाल कर अपनी बात को अलग अंदाज में रखने की कोशिश की।

2029 की राजनीति में अहम हो सकता है Gen-Z वोट

राजनीतिक दलों के लिए Gen-Z सिर्फ सोशल मीडिया पर सक्रिय पीढ़ी नहीं है, बल्कि आने वाले चुनावों में एक बड़ा वोटर समूह भी है। 2024 की बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1997 से 2012 के बीच जन्मे करीब 37.7 करोड़ लोग Gen-Z की श्रेणी में आते हैं।

यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड यानी UNFPA के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 10 से 24 वर्ष की उम्र के करीब 38.2 करोड़ लोग हैं। यह आबादी का बड़ा हिस्सा है और राजनीतिक दल इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।

हालांकि 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग की वोटर हिस्सेदारी में समय के साथ कमी आई है। इसके बावजूद देश में बड़ी संख्या में युवा मतदाता मौजूद हैं और 2029 के चुनाव में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

संसद ने पहले भी अपनाए हैं पॉपुलर ट्रेंड

राजनीति में लोकप्रिय संस्कृति और ट्रेंडिंग शब्दों का इस्तेमाल नया नहीं है। 2019 में फिल्म ‘उरी’ का डायलॉग ‘हाउ इज द जोश?’ सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। इसके बाद कई राजनीतिक नेताओं ने भी इसे अपने भाषणों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया।

इसी तरह ‘जय हो’ और ‘खेला होबे’ जैसे शब्द भी राजनीति में जगह बना चुके हैं। ‘खेला होबे’ पहले बंगाली राजनीतिक और सामाजिक भाषा का हिस्सा बना, फिर पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान यह एक बड़ा राजनीतिक नारा बन गया। बाद में इसे अलग-अलग दलों ने अपने अंदाज में अपनाया।

अब Gen-Z के स्लैंग उसी परंपरा का नया रूप बनकर संसद तक पहुंचते दिखाई दे रहे हैं।

युवाओं की राय- सिर्फ हमारी भाषा बोलने से बात नहीं बनेगी

Gen-Z के बीच इन शब्दों के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ युवाओं का मानना है कि नेताओं ने कई स्लैंग को उनके मूल संदर्भ से अलग तरीके से इस्तेमाल किया है।

खासकर ‘डेलुलू’ जैसे शब्द को लेकर युवाओं का कहना है कि वे इसे कई बार सकारात्मक और मजाकिया संदर्भ में इस्तेमाल करते हैं।

वहीं, कुछ युवाओं का मानना है कि नेताओं को सिर्फ सोशल मीडिया की भाषा अपनाने के बजाय रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और बेहतर अवसरों जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

संसद में Gen-Z की भाषा पहुंचने से यह जरूर साफ हो गया है कि डिजिटल पीढ़ी अब सिर्फ मोबाइल स्क्रीन तक सीमित नहीं है। उसके शब्द, उसके ट्रेंड और उसके विरोध का तरीका देश की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था की बहसों तक पहुंच चुका है। अब देखना यह होगा कि नेताओं का यह नया अंदाज युवाओं से वास्तविक जुड़ाव बनाता है या फिर इसे केवल राजनीतिक ‘कॉपीकैट’ के तौर पर देखा जाएगा।

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