Southern Delta Aquariids और Alpha Capricornids Meteor Shower: जुलाई के आखिरी दिनों में आसमान देखने के शौकीनों के लिए खास खगोलीय अवसर आने वाला है। 30 और 31 जुलाई की रात दो अलग-अलग मीटियोर शावर एक साथ अपने चरम पर पहुंच सकती हैं। हालांकि, लगभग पूर्णिमा जैसे चमकते चांद के कारण हल्की उल्काओं को देखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
30-31 जुलाई की रात दिख सकती हैं ‘टूटते तारों’ की चमक
आसमान में होने वाली इस खास खगोलीय घटना में सदर्न डेल्टा एक्वेरिड्स (Southern Delta Aquariids) और अल्फा कैप्रिकॉनिड्स (Alpha Capricornids) मीटियोर शावर एक साथ सक्रिय रहेंगी। इनके चरम पर पहुंचने का अनुमान 30 और 31 जुलाई की आधी रात के बाद से लेकर सुबह होने से पहले तक लगाया गया है।
उत्तरी गोलार्ध में इसे उल्का-वर्षा के मौसम की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। भारत में भी साफ मौसम और कम रोशनी वाली जगहों से इस नज़ारे को देखने की संभावना है।
चांद की तेज रोशनी बन सकती है बाधा
इस बार रात में चांद काफी चमकीला रहने वाला है। इसकी रोशनी के कारण आसमान में दिखाई देने वाली कम चमक वाली उल्काएं आसानी से नजर नहीं आ सकेंगी। ऐसे में केवल अधिक चमकीली उल्काओं और फायरबॉल के स्पष्ट दिखाई देने की संभावना है।
खगोल विज्ञान के जानकारों के अनुसार, शहरों की रोशनी से दूर किसी अंधेरी जगह पर जाकर आसमान देखने से बेहतर अनुभव मिल सकता है। कुछ समय तक आंखों को अंधेरे के अनुकूल होने देना भी जरूरी है।
सदर्न डेल्टा एक्वेरिड्स में हर घंटे दिख सकती हैं 20 से 25 उल्काएं
अनुकूल और पूरी तरह अंधेरे वातावरण में सदर्न डेल्टा एक्वेरिड्स के दौरान एक घंटे में करीब 20 से 25 उल्काएं दिखाई दे सकती हैं। यह उल्का-वर्षा उस समय बनती है, जब पृथ्वी धूमकेतु 96P/मैकहोल्ज़ की ओर से अंतरिक्ष में छोड़े गए धूल और मलबे के क्षेत्र से गुजरती है।
इससे बनने वाली उल्काएं आमतौर पर तेज गति से चलती हैं और अपेक्षाकृत हल्की दिखाई देती हैं। यही वजह है कि चांद की अधिक रोशनी इनके नज़ारे को प्रभावित कर सकती है।
ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, चिली, अर्जेंटीना और ब्राजील में इसका दृश्य अधिक बेहतर होने की उम्मीद है। भारत, श्रीलंका, मध्य पूर्व और दक्षिणी यूरोप के कुछ हिस्सों में भी लोग इसे देख सकते हैं।
कम उल्काएं, लेकिन चमकदार फायरबॉल दिखा सकती है Alpha Capricornids
दूसरी ओर, अल्फा कैप्रिकॉनिड्स मीटियोर शावर में उल्काओं की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है। सामान्य परिस्थितियों में एक घंटे के दौरान करीब पांच उल्काएं दिखाई दे सकती हैं।
हालांकि, इसकी खासियत इसके चमकीले और धीमी गति से गुजरने वाले फायरबॉल हैं। ये कई बार आसपास के तारों से ज्यादा चमकदार दिखाई देते हैं और आसमान में लंबी रोशनी की लकीर छोड़ सकते हैं।
यह मीटियोर शावर धूमकेतु 169P/NEAT के पीछे छोड़े गए मलबे से जुड़ी मानी जाती है। भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, यूरोप, जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई हिस्सों से इसे देखा जा सकता है।
मीटियोर शावर देखने के लिए क्या करें?
बेहतर नज़ारा देखने के लिए आधी रात के बाद से भोर से पहले का समय अधिक अनुकूल माना जा रहा है। इस दौरान आसमान में मीटियोर शावर का रेडिएंट क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊंचा हो जाता है और चांद की स्थिति भी देखने में कुछ राहत दे सकती है।
मीटियोर देखने के लिए दूरबीन या टेलीस्कोप का इस्तेमाल जरूरी नहीं है। इन उपकरणों से आसमान का बहुत छोटा हिस्सा दिखाई देता है, जबकि उल्काएं किसी भी दिशा में नजर आ सकती हैं। खुले स्थान पर आराम से लेटकर या कुर्सी पर बैठकर आसमान के बड़े हिस्से को देखना बेहतर रहेगा।
आंखों को अंधेरे के अनुकूल होने के लिए करीब 20 से 30 मिनट का समय देना चाहिए। शहर की तेज रोशनी से दूर ग्रामीण इलाकों या खुले स्थानों पर यह दृश्य अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।
अगस्त में भी मिलेगा शानदार खगोलीय नज़ारा
जुलाई के आखिर में होने वाली इन दोनों मीटियोर शावर के बाद अगस्त में पर्सिड मीटियोर शावर भी सक्रिय होगी। इसके 12 और 13 अगस्त के आसपास चरम पर पहुंचने का अनुमान है।
इसके अलावा साल 2026 में ओरायनिड्स, सदर्न टॉरिड्स, नॉर्दर्न टॉरिड्स, लियोनिड्स, जेमिनिड्स और उर्सिड्स जैसी कई अन्य मीटियोर शावर भी दिखाई देंगी।




