क्या बसपा पर मंडरा रहा है नेशनल पार्टी का दर्जा खोने का खतरा?: कई राज्यों में 1% वोट तक नहीं, लोकसभा-राज्यसभा में भी कमजोर हुई पकड़

The Red Ink
बहुजन समाज पार्टी के लिए आने वाला राजनीतिक दौर बेहद अहम माना जा रहा है। कभी राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति रखने वाली बसपा अब कई राज्यों में लगातार कमजोर प्रदर्शन से जूझ रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी के नेशनल पार्टी स्टेटस पर भी सवाल उठने लगे हैं। देश में फिलहाल 6 राष्ट्रीय दल हैं — भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सीपीआई (एम), आम आदमी पार्टी और एनपीपी। लेकिन हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़े बसपा के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। कई राज्यों में पार्टी 1 प्रतिशत वोट तक हासिल नहीं कर सकी, जबकि संसद में उसकी मौजूदगी लगभग खत्म होती दिखाई दे रही है।

बंगाल, तमिलनाडु और केरल में बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बसपा ने 152 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन सभी की जमानत जब्त हो गई। पार्टी को पूरे राज्य में सिर्फ करीब 1.17 लाख वोट मिले, जो कुल वोट शेयर का मात्र 0.18 प्रतिशत था। केरल में भी स्थिति अलग नहीं रही। 140 सीटों वाले राज्य में बसपा ने 55 उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन पार्टी को सिर्फ 33 हजार से थोड़ा ज्यादा वोट मिले। वोट प्रतिशत महज 0.15 रहा। तमिलनाडु में बसपा ने 118 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन वहां भी वोट शेयर 0.11 प्रतिशत तक सिमट गया। तीनों राज्यों को मिलाकर बसपा को करीब 2 लाख वोट मिले, जो किसी भी राज्य में उसे क्षेत्रीय दल की मान्यता दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

बिहार में सीट मिली, लेकिन वोट शेयर बेहद कम
बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा ने 192 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी एक सीट जीतने में कामयाब जरूर रही, लेकिन उसका कुल वोट शेयर सिर्फ 1.62 प्रतिशत रहा। यानी बिहार में भी बसपा राज्य स्तरीय पार्टी का मानक पूरा नहीं कर सकी।

दिल्ली से महाराष्ट्र तक हर जगह कमजोर पड़ी बसपा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में बसपा ने 68 उम्मीदवार उतारे, लेकिन कोई भी उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा पाया। पार्टी को कुल 0.58 प्रतिशत वोट मिले। हरियाणा में इनेलो के साथ गठबंधन के बावजूद बसपा का प्रदर्शन फीका रहा। 35 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी सभी उम्मीदवार हार गए और वोट शेयर 1.82 प्रतिशत पर अटक गया। महाराष्ट्र में बसपा ने 237 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी का वोट शेयर सिर्फ 0.48 प्रतिशत रहा। झारखंड में भी बसपा सभी 81 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद खाता नहीं खोल पाई और वोट प्रतिशत 1% से नीचे रहा।

संसद में भी लगातार कमजोर होती जा रही मौजूदगी
बसपा का लोकसभा में फिलहाल एक भी सांसद नहीं है। राज्यसभा में भी पार्टी की मौजूदगी सिर्फ एक सांसद तक सीमित रह गई है। ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का प्रभाव लगातार कम होता दिखाई दे रहा है।

2014 में भी आया था संकट, नियम बदलने से मिली थी राहत
बसपा को 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। हालांकि 2014 में पार्टी पर यह दर्जा खोने का खतरा मंडराया था। उस समय भी लोकसभा में बसपा का खाता नहीं खुला था और उसका वोट शेयर 4.19 प्रतिशत तक सिमट गया था। तब चुनाव आयोग ने बसपा, एनसीपी और सीपीआई को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनका राष्ट्रीय दर्जा क्यों न खत्म कर दिया जाए। इसके बाद बसपा ने आयोग से समय मांगा और दिल्ली चुनाव तक इंतजार करने की अपील की थी। बाद में 2016 में चुनाव आयोग ने नियमों में बदलाव कर दिया। पहले राष्ट्रीय पार्टी का रिव्यू हर 5 साल में होता था, जिसे बढ़ाकर 10 साल कर दिया गया। इसी फैसले से बसपा को बड़ी राहत मिली थी। इसके बाद यूपी, पंजाब, राजस्थान, बिहार और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बसपा ने 6 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर अपनी क्षेत्रीय मान्यता बचा ली और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी कायम रखा।

अब यूपी और पंजाब जैसे राज्यों पर टिकी नजर
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले यूपी, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभा चुनाव बसपा के लिए बेहद अहम साबित होंगे। अगर इन राज्यों में भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा, तो भविष्य में उसका नेशनल पार्टी स्टेटस खतरे में पड़ सकता है। मायावती की पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाए रखने और नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की है। क्योंकि लगातार घटती चुनावी ताकत बसपा की राष्ट्रीय पहचान पर सीधा असर डाल रही है।

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