बंगाल चुनाव में राहुल गांधी की रैली: ममता पर हमलों पर गूंजा मैदान, मोदी पर प्रतिक्रिया रही फीकी

The Red Ink: पश्चिम बंगाल के Serampore में हुई Rahul Gandhi की चुनावी रैली ने एक दिलचस्प राजनीतिक संकेत दिया। मंच से दिए गए भाषण में जब उन्होंने Mamata Banerjee पर हमला बोला तो भीड़ ने ज़ोरदार समर्थन दिखाया, लेकिन Narendra Modi पर निशाना साधने पर प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत ठंडी रही।

ज़मीन पर फीका दिखा कांग्रेस का असर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हुगली जिले के श्रीरामपुर विधानसभा क्षेत्र में राहुल गांधी की रैली को लेकर शहर में खास उत्साह नजर नहीं आया। टीएमसी और बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस के झंडे, पोस्टर और बैनर बेहद कम दिखाई दिए। यह स्थिति तब है जब यहां से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभांकर सरकार चुनाव मैदान में हैं। स्थानीय स्तर पर कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है, जिसका असर संगठन और माहौल दोनों पर साफ दिखता है।

भीड़ इंतज़ार में, लेकिन उत्साह सीमित
रैली शहर से बाहर एक स्कूल मैदान में आयोजित की गई थी। तेज धूप और उमस के बीच लोग छांव ढूंढते नजर आए। राहुल गांधी निर्धारित समय से काफी देर बाद पहुंचे और करीब 15-20 मिनट का भाषण दिया। इंतज़ार लंबा था, लेकिन भीड़ का मूड पूरी तरह एक जैसा नहीं रहा।

ममता पर हमले पर जोश, मोदी पर सन्नाटा
रैली का सबसे अहम पहलू भीड़ की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं रहीं। जब राहुल गांधी ने ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और स्थानीय नेताओं की मनमानी को लेकर हमला बोला, तो लोगों ने तालियों और नारों से समर्थन दिया। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलों के दौरान वही जोश नजर नहीं आया। विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव राज्य का है, इसलिए लोगों का गुस्सा सीधे राज्य सरकार के खिलाफ ज्यादा दिख रहा है।

जनता की राय: टीएमसी से नाराज़गी, लेकिन विकल्प पर संशय
रैली में शामिल कई लोगों ने राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी को लेकर नाराज़गी जताई। कुछ लोगों का कहना था कि बदलाव जरूरी है, लेकिन बीजेपी को लेकर भी डर बना हुआ है। वहीं, कांग्रेस को अभी मजबूत विकल्प के रूप में नहीं देखा जा रहा। युवा मतदाताओं के बीच यह भावना भी दिखी कि टीएमसी के कमजोर होने पर बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

‘बाइनरी पॉलिटिक्स’ में फंसी कांग्रेस
प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि बंगाल की राजनीति अब दो ध्रुवों—टीएमसी और बीजेपी—के बीच सिमट गई है। एक तरफ यह धारणा बनाई गई कि टीएमसी हटी तो बीजेपी आएगी, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने समर्थन को मजबूत करने के लिए अलग नैरेटिव खड़ा किया। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसी दोध्रुवीय राजनीति को तोड़ना है।

इतिहास: कैसे कमजोर होती गई कांग्रेस
कभी पश्चिम बंगाल की सत्ता पर दशकों तक काबिज रही कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। 1990 के दशक के अंत में ममता बनर्जी के अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। इसके बाद गठबंधन, अंदरूनी मतभेद और संगठनात्मक कमजोरी ने कांग्रेस की स्थिति को और कमजोर कर दिया। आज हालात यह हैं कि राज्य की राजनीति मुख्य रूप से टीएमसी और बीजेपी के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है।

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