The Red Ink
एक साल हो गया… लेकिन कुछ घरों में घड़ी अभी भी 22 अप्रैल 2025 पर अटकी हुई है। Pahalgam attack 2025 ने सिर्फ 26 ज़िंदगियाँ नहीं छीनी थीं उसने दर्जनों घरों से “सामान्य जीवन” भी छीन लिया था। सरकारें बयान दे चुकीं, सीमाओं पर तनाव आकर चला गया…लेकिन जिनके अपने नहीं लौटे उनके लिए कुछ भी “खत्म” नहीं हुआ।
एक कमरा… जहां सब कुछ वैसा ही रखा है
कानपुर की Aishanya Dwivedi अपने कमरे में खड़ी होती हैं और बिना कुछ छुए वापस आ जाती हैं। बिस्तर का आधा हिस्सा आज भी खाली है…और खाली ही रखा गया है। “वो हिस्सा शुभम का है…” इतना कहकर वो चुप हो जाती हैं। उनके पति Shubham Dwivedi उन्हीं 26 लोगों में थे, जिन्हें उस दिन सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वो गलत जगह, गलत समय पर थे।
दो महीने पहले ही शादी हुई थी
हनीमून जैसा एक ट्रिप… और फिर सब खत्म। आज भी फोन में उनकी फोटो है… वीडियो है…और एक आदत है बार-बार उन्हें देखने की।
“मुझे भी मार दो…” लेकिन वो ज़िंदा छोड़ दी गईं
हमले के दिन जो हुआ, उसे वो भूल नहीं पाईं। उन्होंने हमलावरों से कहा था “मुझे भी मार दो…” लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया। अब वो जी रही हैं यादों के साथ। कभी बात करके…कभी रोकर…कभी लिखकर…दूसरी तरफ एक ऐसा घर जहां नाम तक नहीं लिया जाता।
हर कहानी एक जैसी नहीं होती करनाल में Rajesh Narwal का घर है जहां उनके बेटे Vinay Narwal का नाम तक लेने से लोग बचते हैं। 26 साल का बेटा शादी को एक हफ्ता भी नहीं हुआ था और फिर एक गोली ने सब खत्म कर दिया। पिता कहते हैं “हम फोटो तक नहीं लगा पा रहे… हिम्मत ही नहीं होती।” कमरे में सामान रखा है जैसे वो अभी लौट आएगा।
दर्द—दो तरीके, एक ही खालीपन
कहीं लोग हर दिन बैठकर अपनों की बातें करते हैं कहीं खामोशी ही एकमात्र सहारा है। लेकिन दोनों जगह एक चीज़ कॉमन है वो खालीपन जो कभी नहीं भरता। ज़िंदगी चल रही है पर पूरी नहीं है Aishanya Dwivedi कहती हैं “दुख खत्म नहीं होगा… लेकिन जीना बंद भी नहीं कर सकते।” वो लिखती हैं रोती हैं कभी-कभी बस आसमान देखती हैं और महसूस करती हैं कि शायद वो अभी भी कहीं आसपास हैं।




