The Red Ink
लखनऊ से संचालित एक अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह की जांच में हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। पुलिस के मुताबिक, अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाला यह नेटवर्क बेहद शातिर तरीके से काम करता था, जबकि इसके कई सदस्य सिर्फ छठी, आठवीं या दसवीं तक पढ़े हुए हैं। अंग्रेजी बोलने की विशेष ट्रेनिंग देकर उन्हें विदेशी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के अधिकारी के रूप में पेश किया जाता था।
कम पढ़े-लिखे, लेकिन साइबर ठगी में थे माहिर
क्राइम ब्रांच की जांच में सामने आया कि गिरफ्तार आरोपियों में कोई छठी पास है, कोई आठवीं और कोई दसवीं तक पढ़ा है। गिरोह में इंटरमीडिएट से अधिक शिक्षित कोई सदस्य नहीं मिला। इसके बावजूद सभी को अमेरिकी उच्चारण (American Accent) में अंग्रेजी बोलने की विशेष ट्रेनिंग दी गई थी, ताकि वे विदेशी नागरिकों का भरोसा आसानी से जीत सकें।
माइक्रोसॉफ्ट और FTC अधिकारी बनकर करते थे ठगी
जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी खुद को Microsoft और Federal Trade Commission (FTC) का अधिकारी बताकर अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करते थे। तकनीकी समस्या, अकाउंट सुरक्षा या फर्जी जांच का डर दिखाकर लोगों को झांसे में लिया जाता और फिर उनसे बड़ी रकम ठग ली जाती थी।
हर सफल ठगी पर मिलता था 10% कमीशन
पुलिस के मुताबिक, गिरोह में काम करने वाले कर्मचारियों को हर सफल ठगी पर करीब 10 प्रतिशत कमीशन दिया जाता था। गिरोह के अंदर इस प्रक्रिया को “साइबर क्लोजर” कहा जाता था। ठगी की डील फाइनल करने और कॉल संभालने के लिए विशेष रूप से कोलकाता से लोगों को बुलाया गया था।
अहमदाबाद से संचालित होता था पूरा नेटवर्क
क्राइम ब्रांच के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड यश चंद्र और प्रकाश वर्मा हैं, जो अहमदाबाद के रहने वाले बताए जा रहे हैं। जांच में सामने आया है कि दोनों विदेश में बैठे नेटवर्क और हवाला चैनलों के जरिए ठगी की रकम के लेन-देन को नियंत्रित करते थे। फिलहाल दोनों फरार हैं और पुलिस उनकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
लखनऊ से संभाला जाता था ऑपरेशन
पुलिस के अनुसार, लखनऊ में इस पूरे ऑपरेशन का संचालन पुनीत वर्मा और दीपेन पटेल कर रहे थे। यहीं से कॉल सेंटर संचालित होता था और विदेशी नागरिकों से संपर्क कर साइबर ठगी को अंजाम दिया जाता था।
हवाला के जरिए भारत पहुंचता था पैसा
जांच में पता चला कि ठगी की रकम सीधे भारतीय बैंक खातों में नहीं आती थी। पहले अमेरिका में मौजूद गिरोह के सदस्य गिफ्ट कार्ड और नकदी के जरिए पैसे इकट्ठा करते थे। इसके बाद हवाला नेटवर्क के माध्यम से रकम भारत भेजी जाती थी। पुलिस के मुताबिक, डॉलर का हिसाब 72 से 73 रुपये प्रति डॉलर की दर से किया जाता था।
ओमेक्स और समिट बिल्डिंग के बीच कनेक्शन की जांच
क्राइम ब्रांच ने शहीद पथ स्थित ओमेक्स R-2 सोसाइटी के चार फ्लैटों—1902, 1904, 1301 और 901—में छापेमारी की थी। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि समिट बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 1301 में चल रहे संदिग्ध कॉल सेंटर से जुड़े एक प्रोग्राम मैनेजर किराये पर रह रहे थे। अब पुलिस दोनों स्थानों के बीच संभावित नेटवर्क और कनेक्शन की जांच कर रही है।
DCP क्राइम ने क्या कहा?
डीसीपी क्राइम अनिल यादव ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों में दो छठी पास, एक आठवीं पास, एक दसवीं पास और तीन इंटरमीडिएट तक शिक्षित हैं। उन्होंने कहा कि फरार सरगनाओं, फंडिंग नेटवर्क और पूरे अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह की जांच अभी जारी है।




